कविकुल-चक्रचूडामणि गोसाईं श्रीतुलसीदासजीके ग्रन्थोंमें कलेवरकी दृष्टिसे रामचरितमानसके पश्चात् दूसरा नम्बर गीतावलीका ही है। इसमें सम्पूर्ण रामचरितका पदोंमें वर्णन किया गया है, परंतु रामायणकी अपेक्षा इसकी वर्णनशैली कुछ दूसरे ही ढंगकी है। रामायण महाकाव्य है, उसमें सभी रसोंका साङ्गोपाङ्ग दिग्दर्शन कराया गया है; वहाँ कविहृदयके सभी भावोंका गम्भीर विश्लेषण देखनेमें आता है। परंतु गीतावलीमें आरम्भसे लेकर अन्तपर्यन्त कविका एक ही भाव दिखायी देता है; वह कथानकके क्रमकी अपेक्षा न करके अपने इष्टदेवकी मधुर झाँकी करनेमें ही संलग्न है। गीतावलीमें उसका ललित भाव ही व्यक्त हुआ है।