॥ श्रीहरि:॥

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गीता के परम प्रचारक

हिन्दी/संस्कृत

लेखनीसे आबद्ध न होनेवाले एक ऐसे महापुरुषका जीवन-चरित्र है जो साधारण गृहस्थ होकर भी परम ज्ञाननिष्ठ, साधारण व्यापारी होकर भी उच्चकोटिके दार्शनिक, निष्कामके आचार्य, पहले करनी करके पुन: कथनी कहनेवाले, सादगी व सरलताके प्रतिमूर्ति, नियमके पक्के, मानवमात्र भगवत्प्राप्तिके लिये अग्रसर हो—इसके लिये जीवन-पर्यन्त आध्यात्मिक प्रेरक, गीता-प्रचारके लिये गीताप्रेस, भगवत् -चिन्तन और भगवत् -प्राप्ति हेतु साधन-भजन-सत्संग सामूहिक रूपसे लोग कर सकें इसके लिये गीताभवन (स्वर्गाश्रम, ऋषीकेश), भारतीय शिक्षण पद्धतिसे ज्ञानवान्, चरित्रवान् तथा भगवत्प्राप्ति हेतु प्रयासी बच्चे तैयार हों इसके लिये श्रीऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम (चूरू) आदिके संस्थापक, कर्तव्य-परायण, सच्चे-वात्सल्य तथा व्यवहारके निर्वाहक, चराचरके सच्चे सुहृद्, अमानी और निरन्तर भगवान् के चिन्तनमें निमग्न रहनेवाले थे।
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  • श्रीमद्भगवद्गीताके प्रचारका कारण
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    जयदयालजी गोयन्दकाद्वारा स्थापित प्रकल्पोंका विकास-क्रम
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    • श्रीसेठजी द्वारा ऋषिकेशमें सत्संग
    • प्रपञ्चसे उपरामता: बम्बई छोड़नेका निश्चय
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