श्रीमद्भगवद्गीता का संस्कृत-वाङ्मयमें प्रमुख स्थान है। यह भगवान् श्रीकृष्णके श्रीमुखसे निकली हुई दिव्य वाणी है। इसमें भगवान् श्रीकृष्णने विषादयुक्त अर्जुनको तत्त्वात्मक उपदेश दिया है; जिसके भाव परम गहन हैं। उनका पार अभीतक न कोई पा सका है और न पा सकता है।
उसी गीतातत्त्व-सागरमें डुबकी लगाकर श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज ने अनेक तत्त्वरत्नोंको खोज निकाला है, जिन्हें विविध प्रकाशनोंके रूपमें जनताको वितरित कर दिया है। उनसे भावुक जनता लाभ उठा रही है। उन्हीं रत्नोंमेंसे यह एक अमूल्य रत्न गीता-दर्पण भी है। यह ‘यथा नाम तथा गुण’ इस उक्तिके अनुसार सचमुच गीता-तत्त्वको प्रत्यक्ष देखनेके लिये दर्पण-सदृश ही है। इसके प्रारम्भमें गीताके अठारहों अध्यायोंके तत्त्वोंपर प्रश्नोत्तररूपमें प्रकाश डाला गया है। तत्पश्चात् प्रधान-प्रधान विषयोंका लेखरूपमें विस्तारपूर्वक समाधान किया गया है, गीताके शब्दोंको समझनेके लिये व्याकरण और छन्दसम्बन्धी गूढ़ विवेचन किया गया है, गीताके श्लोकोंके परिमाणके विषयमें विस्तृत एवं प्रामाणिक समाधान प्रस्तुत किया गया है, पाठकोंकी सुविधाके निमित्त पाठ-विधियाँ दर्शायी गयी हैं तथा अन्तमें प्रमुख शब्दोंके विभिन्नार्थपर पृथक्-पृथक् विचार प्रकट किया गया है। इन सब कारणोंसे इस ग्रन्थरत्नकी उपादेयता विशेष बढ़ गयी है।
वर्तमान समयमें साधकोंका सही मार्गदर्शन करनेके लिये तत्त्वात्मक ग्रन्थोंका अभाव-सा है, अत: उसके कुछ अंशकी पूर्तिके लिये यह गीता-दर्पण सक्षम है। इसलिये साधकोंसे विनम्र अनुरोध है कि वे इस ग्रन्थरत्नका सावधानतया अध्ययन करें, गम्भीरतापूर्वक मनन करें और इससे विशेष लाभ उठावें।