॥ श्रीहरि:॥

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गीता दर्पण

श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज

हिन्दी/संस्कृत

श्रीमद्भगवद‍्गीता का संस्कृत-वाङ्मयमें प्रमुख स्थान है। यह भगवान् श्रीकृष्णके श्रीमुखसे निकली हुई दिव्य वाणी है। इसमें भगवान् श्रीकृष्णने विषादयुक्त अर्जुनको तत्त्वात्मक उपदेश दिया है; जिसके भाव परम गहन हैं। उनका पार अभीतक न कोई पा सका है और न पा सकता है।
उसी गीतातत्त्व-सागरमें डुबकी लगाकर श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज ने अनेक तत्त्वरत्नोंको खोज निकाला है, जिन्हें विविध प्रकाशनोंके रूपमें जनताको वितरित कर दिया है। उनसे भावुक जनता लाभ उठा रही है। उन्हीं रत्नोंमेंसे यह एक अमूल्य रत्न गीता-दर्पण भी है। यह ‘यथा नाम तथा गुण’ इस उक्तिके अनुसार सचमुच गीता-तत्त्वको प्रत्यक्ष देखनेके लिये दर्पण-सदृश ही है। इसके प्रारम्भमें गीताके अठारहों अध्यायोंके तत्त्वोंपर प्रश्नोत्तररूपमें प्रकाश डाला गया है। तत्पश्चात् प्रधान-प्रधान विषयोंका लेखरूपमें विस्तारपूर्वक समाधान किया गया है, गीताके शब्दोंको समझनेके लिये व्याकरण और छन्दसम्बन्धी गूढ़ विवेचन किया गया है, गीताके श्लोकोंके परिमाणके विषयमें विस्तृत एवं प्रामाणिक समाधान प्रस्तुत किया गया है, पाठकोंकी सुविधाके निमित्त पाठ-विधियाँ दर्शायी गयी हैं तथा अन्तमें प्रमुख शब्दोंके विभिन्नार्थपर पृथक्-पृथक् विचार प्रकट किया गया है। इन सब कारणोंसे इस ग्रन्थरत्नकी उपादेयता विशेष बढ़ गयी है।
वर्तमान समयमें साधकोंका सही मार्गदर्शन करनेके लिये तत्त्वात्मक ग्रन्थोंका अभाव-सा है, अत: उसके कुछ अंशकी पूर्तिके लिये यह गीता-दर्पण सक्षम है। इसलिये साधकोंसे विनम्र अनुरोध है कि वे इस ग्रन्थरत्नका सावधानतया अध्ययन करें, गम्भीरतापूर्वक मनन करें और इससे विशेष लाभ उठावें।
  • प्रथम पृष्ठ
  • नम्र निवेदन
  • प्राक्‍कथन
  • मंगलाचारण
  • +
    गीताके प्रत्येक अध्यायका तात्पर्य
    • पहला अध्याय
    • दूसरा अध्याय
    • तीसरा अध्याय
    • चौथा अध्याय
    • पाँचवाँ अध्याय
    • छठा अध्याय
    • सातवाँ अध्याय
    • आठवाँ अध्याय
    • नवाँ अध्याय
    • दसवाँ अध्याय
    • ग्यारहवाँ अध्याय
    • बारहवाँ अध्याय
    • तेरहवाँ अध्याय
    • चौदहवाँ अध्याय
    • पन्द्रहवाँ अध्याय
    • सोलहवाँ अध्याय
    • सत्रहवाँ अध्याय
    • अठारहवाँ अध्याय
  • गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
  • गीतामें ईश्वरवाद
  • गीतामें श्रीकृष्णकी भगवत्ता
  • गीतामें अवतारवाद
  • गीतामें मूर्तिपूजा
  • गीतामें भगवन्नाम
  • गीतामें फलसहित विविध उपासनाओंका वर्णन
  • गीतामें आहारीका वर्णन
  • गीतामें भगवान‍्की उदारता
  • गीतामें भगवान‍्की न्यायकारिता और दयालुता
  • गीतामें भगवान‍्का विविध रूपोंमें प्रकट होना
  • गीतामें धर्म
  • गीतामें सनातनधर्म
  • गीतामें ज्योतिष
  • गीता और गुरु-तत्त्व
  • गीता और वेद
  • गीतामें जातिका वर्णन
  • गीतामें चार आश्रम
  • गीतामें सैनिकोंके लिये शिक्षा
  • गीतामें भगवान‍्की शक्तियाँ
  • +
    गीतामें विभूति-वर्णन
    • विभूति-वर्णनका उद्देश्य
    • विभूतियोंकी दिव्यता
  • गीतामें विश्वरूप-दर्शन
  • गीतामें सृष्टि-रचना
  • +
    गीतामें जीवकी गतियाँ
    • ऊर्ध्वगति
    • अधोगति
    • मध्यगति*
  • गीतामें मनुष्योंकी श्रेणियाँ
  • +
    गीतामें श्रद्धा
    • दैवी श्रद्धा
    • आसुरी श्रद्धा
  • गीतामें देवताओंकी उपासना
  • गीतामें प्राणिमात्रके प्रति हितका भाव
  • गीतामें एक निश्चयकी महिमा
  • गीतामें द्विविध सत्ताका वर्णन
  • गीतामें द्विविधा इच्छा
  • गीतामें त्रिविध चक्षु
  • गीतामें त्रिविध रतियाँ
  • गीतामें विविध विद्याएँ
  • गीता और संसारमें रहनेकी विद्या
  • गीतामें विविध आज्ञाएँ
  • +
    गीतामें विभिन्न मान्यताएँ
    • १. भगवान‍्की मान्यता
    • २. अर्जुनकी मान्यता
    • ३. संजयकी मान्यता
    • ४. सिद्धकी मान्यता
    • ५. साधक और असाधककी मान्यता
    • ६. भक्त और अभक्तकी मान्यता
    • ७. दैवी और आसुरी प्रकृतिवालोंकी मान्यता
  • गीतामें स्वाभाविक और नये परिवर्तनका वर्णन
  • गीतामें स्वभावका वर्णन
  • गीतामें दैवी और आसुरी सम्पत्ति
  • +
    गीताका योग
    • तीनों योगोंसे कर्मों (पापों)-का नाश
    • तीनों योगोंसे निर्वाण-पदकी प्राप्ति
    • तीनों योगोंकी एकता
    • तीनों योगोंमें कर्मोंका हेतु बननेका निषेध
  • +
    गीतोक्त योगके सब अधिकारी
    • भक्तियोगके अधिकारी
    • ज्ञानयोगके अधिकारी
    • कर्मयोगके अधिकारी
  • गीतामें तीनों योगोंकी समानता
  • +
    गीतामें तीनों योगोंकी महत्ता
    • कर्मयोग
    • ज्ञानयोग
    • भक्तियोग
  • गीतामें योग और भोग
  • गीतामें बन्ध और मोक्षका स्वरूप
  • गीतामें समता
  • गीतामें क्रिया, कर्म और भाव
  • गीतामें कर्मकी व्यापकता
  • गीतामें ‘यज्ञ’ शब्दकी व्यापकता
  • गीतामें लोकसंग्रह
  • गीतोक्त प्रवृत्ति और आरम्भ
  • गीतामें त्यागका स्वरूप
  • गीतामें निर्द्वन्द्व होनेकी महत्ता
  • गीतामें अहंता-ममताका त्याग
  • गीतामें कर्तृत्व-भोक्तृत्वका निषेध
  • गीतामें गुणोंका वर्णन
  • गीतामें परमात्मा और जीवात्माका स्वरूप
  • गीतामें ईश्वर और जीवात्माकी स्वतन्त्रता
  • +
    गीतामें सत्, चित् और आनन्द
    • ‘सत्’
    • ‘चित्’
    • ‘आनन्द’
  • गीतामें अष्टांगयोगका वर्णन
  • गीतामें द्विविधा भक्ति
  • गीतामें नवधा भक्ति
  • गीतामें भक्तियोगकी मुख्यता
  • गीताका आरम्भ और पर्यवसान शरणागतिमें
  • गीतामें आश्रयका वर्णन
  • गीतामें भगवान‍्का आश्वासन
  • गीतामें सगुणोपासनाके नौ प्रकार
  • गीताका गोपनीय विषय
  • +
    गीतामें साधकोंकी दो दृष्टियाँ
    • (१)
    • (२)
  • गीतामें साध्य और साधनकी सुगमता
  • गीतामें सर्वश्रेष्ठ साधन
  • +
    गीतामें प्रवृत्ति और निवृत्तिपरक साधन
    • कर्मयोग
    • ज्ञानयोग
    • भक्तियोग
  • गीतामें सिद्धोंके लक्षण
  • गीतामें भगवान् और महापुरुषका साधर्म्य
  • गीताका तात्पर्य
  • गीतामें संवाद
  • गीतामें अर्जुनद्वारा स्तुति, प्रार्थना और प्रश्न
  • गीतामें अर्जुनकी युक्तियाँ और उनका समाधान
  • गीतामें भगवान‍्के विवेचनकी विशेषता
  • +
    गीतामें भगवान‍्की विषय-प्रतिपादन-शैली
    • (क)
    • (ख)
    • (ग)
    • (घ)
    • (ङ)
    • (च)
    • (छ)
  • गीतामें भगवान‍्की वर्णन-शैली
  • गीतोक्त अन्वय-व्यतिरेक वाक्योंका तात्पर्य
  • गीतामें आये परस्पर-विरोधी पदोंका तात्पर्य
  • गीतामें आये समान चरणोंका तात्पर्य
  • गीतामें आये समानार्थक पदोंका तात्पर्य
  • गीतामें आये पुनरुक्त समानार्थक वाक्योंका तात्पर्य
  • गीतामें आये विपरीत क्रमका तात्पर्य
  • गीतामें आये ‘मत्त:’ पदका तात्पर्य
  • गीतामें आये ‘अवश:’ पदका तात्पर्य
  • गीतामें आये ‘तत्त्वत:’ पदका तात्पर्य
  • गीतामें ‘यत्’ शब्दके दो बार प्रयोगका तात्पर्य
  • गीतामें आये ‘कृत्वा’, ‘ज्ञात्वा’ और ‘मत्वा’ पदोंका तात्पर्य
  • गीतामें ‘तत्’ और ‘अस्मत्’ पदसे भगवान‍्का वर्णन
  • गीतापर विहंगम दृष्टि
  • +
    गीता-पाठकी विधियाँ
    • करन्यास—
    • हृदयादिन्यास—
    • संस्कृत भाषाका शुद्ध उच्चारण करनेकी विधि
  • गीतोक्त श्लोकोंके अनुष्ठानकी विधि
  • +
    गीतामें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृतिकी अलिंगता
    • (१) ईश्वरके लिये—
    • (२) जीवात्माके लिये—
    • (३) प्रकृतिके लिये—
  • गीताका अनुबन्ध-चतुष्टय
  • गीताका षड‍‍्लिंग
  • +
    गीतामें काव्यगत विशेषताएँ
    • (क)
    • (ख)
  • गीतामें अलंकार
  • गीतामें अभिधा आदि शक्तियोंका वर्णन
  • +
    गीता-सम्बन्धी व्याकरणकी कुछ बातें
    • (१)
    • (२)
    • (३)
    • (४)
    • (५)
    • (६)
    • (७)
    • (८)
    • (९)
    • (१०)
    • (११)
    • (१२)
    • (१३)
    • (१४)
    • (१५)
    • (१६)
    • (१७)
    • (१८)
    • (१९)
    • (२०)
    • (२१)
    • (२२)
    • (२३)
    • (२४)
    • (२५)
    • (२६)
    • (२७)
    • (२८)
    • (२९)
    • (३०)
    • (३१)
    • (३२)
    • (३३)
    • (३४)
    • (३५)
    • (३६)
    • (३७)
  • +
    गीताके छन्द
    • छन्दोंके सम्बन्धमें कुछ ज्ञातव्य बातें
    • गीतामें प्रयुक्त छन्दोंपर विचार
    • अनुष्टुप् छन्द
    • ‘व्यक्तिपक्ष-विपुला’ संज्ञावाले १२७ श्लोकोंकी तालिका
    • ‘जातिपक्ष-विपुला’ संज्ञावाले ३ श्लोकोंकी तालिका
    • ‘संकीर्ण-विपुला’ संज्ञावाले ८ श्लोकोंकी तालिका
    • त्रिष्टुप् छन्द
    • उपजाति छन्द
    • इन्द्रवज्रा छन्दके तीन श्लोक
    • उपेन्द्रवज्रा छन्दके तीन श्लोक
    • इन्द्रवज्रा-उपेन्द्रवज्रा-मिश्रित मुख्य उपजातिके पंद्रह श्लोक
    • भिन्न-भिन्न छन्द-मिश्रित उपजातिके चौंतीस श्लोक
  • गीतामें आर्ष-प्रयोग
  • +
    गीताका परिमाण और पूर्ण शरणागति
    • श्रीमद्भगवद‍्गीता
    • उवाच भी श्लोक
    • भगवत्प्रेरित अर्जुन
    • लोकसंग्राहक श्रीभगवान्
    • भगवत्स्वरूप अर्जुन
    • शरणागतिसे पूर्व ‘अर्जुन उवाच’
    • ‘श्रीभगवानुवाच’ की पुनरुक्ति क्यों?
    • भगवान‍्के छ: सौ बीस श्लोक
    • अर्जुनके सत्तावन श्लोक
    • संजयके सड़सठ श्लोक
    • धृतराष्ट्रका एक श्लोक
    • गीता-परिमाणके अनुसार तालिका
  • गीतोक्त संक्षिप्त सूक्ति-संग्रह
  • +
    गीताका अनेकार्थ-शब्दकोश
    • १. अकर्म
    • २. अक्षर
    • ३. अचल
    • ४. अचिन्त्य
    • ५. अध्यात्म
    • ६. अपर
    • ७. अप्रमेय
    • ८. अमृत
    • ९. अवश
    • १०. अव्यक्त
    • ११. अव्यय
    • १२. अशुभ
    • १३. असत्
    • १४. अहंकार
    • १५. आत्मा
    • १६. इष्ट
    • १७. ईश्वर
    • १८. एक
    • १९. कर्म
    • २०. काम
    • २१. काल
    • २२. कूटस्थ
    • २३. गति
    • २४. गुण
    • २५. जगत्
    • २६. ज्ञान
    • २७. ज्ञानी
    • २८. ज्ञेय
    • २९. तुष्ट
    • ३०. देव
    • ३१. धर्म
    • ३२. पर
    • ३३. परमात्मा
    • ३४. पुण्य
    • ३५. पुरा
    • ३६. पुरुष
    • ३७. प्रकृति
    • ३८. प्रसाद
    • ३९. प्रिय
    • ४०. बल
    • ४१. बीज
    • ४२. बुद्धि
    • ४३. ब्रह्म
    • ४४. ब्राह्मण
    • ४५. भाव
    • ४६. भूत
    • ४७. मन
    • ४८. महात्मा
    • ४९. मौन
    • ५०. यज्ञ
    • ५१. युक्त
    • ५२. योग
    • ५३. योगी
    • ५४. लोक
    • ५५. शान्ति
    • ५६. शौच
    • ५७. श्रेय
    • ५८. सत्
    • ५९. सत्त्व
    • ६०. सम
    • ६१. सर्ग
    • ६२. सर्वगत
    • ६३. सिद्ध
    • ६४. सिद्धि
    • ६५. सुख
    • ६६. संन्यास
    • ६७. संन्यासी
    • अध्याय-श्लोक – पद – श्लोक-प्रतीक
    • ६८. स्थान
    • ६९. स्वभाव
  • अंतिम पृष्ठ

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