श्रीमद्भगवद्गीता साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके श्रीमुखकी वाणी है। इसलिये वह सर्वशास्त्रमयी है—सारे शास्त्रोंका सार भरा हुआ है। इसकी महिमा अनन्त है। हमारे शास्त्रोंमें स्थान-स्थानपर इसकी महिमाका वर्णन किया गया है। चाहे मनुष्य किसी भी धर्म या सम्प्रदायको माननेवाला हो, गीताका उपदेश किसी भी दिशा या दशामें पड़े हुए प्राणीको ठीक उपयुक्त मार्गपर लाकर उसे कल्याणकी ओर लगा देता है। भिन्न-भिन्न रुचि और अधिकार रखनेवाले मनुष्योंको उनकी योग्यताके अनुसार ही कर्तव्य-कर्ममें प्रवृत्त कर भगवान् की ओर गति करा देना ही इसका मुख्य तात्पर्य है।