॥ श्रीहरि:॥

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गंगालहरी

हिन्दी/संस्कृत

सकल-कल्मष-ध्वंसिनी सुकृत-राशि-प्रवर्षिणी हिमाद्रि-हृदयागार-प्रकाशिनी शशांक-शेखर-भगवान शंकर के जटा-जूट रूपी आंगन में विहार करने वाली जीवमात्र पर अनुग्रह कर उसको भव सागर से पार करने वाली ब्रह्मद्रवा भगवती भागीरथी मां गंगा पुण्यात्माओं द्वारा सेवित पूजित वंदित तथा अभिनंदित है।
भारतवर्ष की उपासना परंपरा में एक वर्ग है जो निराकारोपासक है। दूसरा साकारोपासन में निरत है। परन्तु एक अन्य ही विलक्षणता सम्पन्न वर्ग है जो नीराकार (जलरूप-ब्रह्मद्रव) ब्रह्मद्रवा अर्थात् मां गंगा की उपासना करता हुआ अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है।
केचित् भजन्ति साकारं,
निराकारं तथापरे।
वयं तु जाह्नवीभक्ताः,
नीराकारमुपास्महे॥
ऋषिकुल से लेकर कृषिकुल तक समान भाव से समादृत भगवती मां गंगा की महिमा का गान करते करते श्रुतिस्मृतिपुराणोपपुराणेतिहास अघाते नहीं हैं।
भगवान शंकराचार्य तो मां गंगा को स्वर्ग की सीढी बताते हैं।
(स्वर्गसोपानसंगे)
रसगंगाधर सदृश अनुपम काव्यशास्त्र के रचयिता पंडितराज जगन्नाथ भी मां गंगा के अनुपम भक्त थे। ज्ञान विज्ञान से सम्पन्न भक्तिभावार्द्रमानस जगन्नाथ जी का जब अंतिम समय आया तब वे गंगाजी के उस घाट पर बैठे जहां से गंगाजी तक पहुंचने के लिए 52 सीढी उतरना पडता था। अति वार्धक्य के कारण जगन्नाथ जी ने वही बैठे बैठे ही श्लोकबद्ध स्तुति करना प्रारम्भ किया, एक श्लोक जब तक पूरा होता मां गंगा एक सीढी ऊपर चढ जाती।
इस प्रकार वावन श्लोकों की स्तुति अर्थात गंगालहरी जैसे ही पूर्ण हुई मां गंगा जगन्नाथ जी को अपनी तरंगरूपी गोद में बिठाकर ले गयी। और पंडितराज अमर हो गये। ऐसी करुणामयी मां गंगा आप सभी का मनोरथ पूर्ण कर सन्मति सहित सद्‍गति प्रदान करे।
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