॥ श्रीहरि:॥

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गजेन्द्रमोक्ष

हिन्दी/संस्कृत

श्रीमद्भागवतके अष्टम स्कन्धमें गजेन्द्रमोक्षकी कथा है। द्वितीय अध्यायमें ग्राहके साथ गजेन्द्रके युद्धका वर्णन है, तृतीय अध्यायमें गजेन्द्रकृत भगवान् के स्तवन और गजेन्द्रमोक्षका प्रसंग है और चतुर्थ अध्यायमें गज-ग्राहके पूर्वजन्मका इतिहास है। श्रीमद्भागवतमें गजेन्द्रमोक्ष- आख्यानके पाठका माहात्म्य बतलाते हुए इसको स्वर्ग तथा यशदायक, कलियुगके समस्त पापोंका नाशक, दु:स्वप्ननाशक और श्रेय:साधक कहा गया है। तृतीय अध्यायका स्तवन बहुत ही उपादेय है। इसकी भाषा और भाव सिद्धान्तके प्रतिपादक और बहुत ही मनोहर हैं। भावके साथ स्तुति करते-करते मनुष्य तन्मय हो जाता है। महामना श्रीमालवीयजी महाराज कहा करते थे कि गजेन्द्रकृत इस स्तवनका आर्तभावसे पाठ करनेपर लौकिक-पारमार्थिक महान् संकटों और विघ्नोंसे छुटकारा मिल जाता है और निष्कामभाव होनेपर अज्ञानके बन्धनसे छूटकर पुरुष भगवान् को प्राप्त हो जाता है। स्वयं भगवान् का वचन है कि ‘जो रात्रिके शेषमें (ब्राह्ममुहूर्तके प्रारम्भमें) जागकर इस स्तोत्रके द्वारा मेरा स्तवन करते हैं, उन्हें मैं मृत्युके समय निर्मल मति (अपनी स्मृति) प्रदान करता हूँ।’ और ‘अन्ते मति: सा गति:’ के अनुसार उसे निश्चय ही भगवान् की प्राप्ति हो जाती है तथा इस प्रकार वह सदाके लिये जन्म-मृत्युके बन्धनसे छूट जाता है। संस्कृत न जाननेवाले भाई-बहिनोंके लिये इस स्तवनका सुन्दर भावार्थ लिख दिया गया है। आशा है कि पाठक इससे लाभ उठावेंगे।
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