॥ श्रीहरि:॥

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गजलगीता

हिन्दी/संस्कृत

भगवद्‍गीता साक्षात् भगवान् कृष्णकी दिव्य वाणी है। श्रीभगवान् ने अर्जुनको निमित्त बनाकर कलियुगके जीवोंके शोकनिवारणार्थ तथा उनके कल्याणके लिये भगवद्‍‍गीताका उपदेश दिया है। गीताजीके बारहवें अध्यायका नाम भक्तियोग है। कलियुगमें भक्तिका साधन ही जीवोंके उद्धारके लिये श्रेष्ठ माना गया है। श्रीभगवान् ने बारहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें यह स्वीकार किया है कि मनुष्योंमें देहाभिमान स्वतः रहनेके कारण उनके लिये ज्ञानका मार्ग कठिन है—
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥
श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका जिन्होंने गीताप्रेसकी स्थापना की थी तथा गीतातत्त्वविवेचनी जैसा अद्‍भुत ग्रन्थ विश्वको प्रदान किया, उनके मनमें एक विलक्षण भाव था कि किस प्रकारसे जीवमात्रका कल्याण हो। इसके लिये वे सुगम उपायकी खोज किया करते थे। उन्होंने गजलगीताकी रचना की जिसका पाठ करनेसे भगवान् में भक्ति बढ़े तथा पाठ करनेवाले का कल्याण हो। इसमें गीताजीके बारहवें अध्यायके श्लोक संख्या १ से ८ तकके श्लोकोंका पद्यानुवाद बड़े भावपूर्ण शब्दोंमें किया गया है। भगवान् के भक्तका कैसा भाव होना चाहिये तथा वह कैसे भगवान् में प्रेम करे— इन बातोंका इन चालीस पदोंमें वर्णन किया गया है। इसे कुछ सज्जन गीताचालीसाके नामसे पुकारते हैं। रात्रिमें सोते समय इसके पाठसे विशेष लाभ (भगवद्भक्ति/प्रेमकी वृद्धि) हो सकता है। इस अभिप्रायसे इस गजलगीताकी रचना की गयी है। 
 हमें आशा है कि इसे कण्ठस्थ करके रात्रिमें शयनके समय यदि इसका पाठ करके सोवें तो शयनकाल भी साधनमय हो सकता है।
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