॥ श्रीहरि:॥

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एक महात्मा का प्रसाद

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • प्रथम भाग
  • १. निरन्तर साधनका स्वरूप
  • २. चित्त-शुद्धिका उपाय
  • ३. साधनोपयोगी सिद्धान्त
  • ४. भावकी शुद्धिसे कर्मकी शुद्धि
  • ५. अपने दोषोंको देखने और मिटानेकी युक्ति
  • ६. भगत्प्रेमकी प्राप्तिका उपाय
  • ७. अहंता, ममता और कामनाका स्वरूप तथा उनके नाशका उपाय एवं प्रेमकी अभिव्यक्ति
  • ८. योग, बोध और प्रेम क्रियासाध्य नहीं है। विवेकका आदर ही इनकी प्राप्तिका उपाय है
  • ९. सुख-दुःखका कारण किसी वस्तु या प्राणीको न मानना राग-द्वेषके नाशका उपाय है
  • १०. परदोष-दर्शनका और दोषोंके चिन्तनका सर्वथा त्याग करके निर्दोषता प्राप्त करनेकी प्रेरणा
  • ११. साधनमें दूसरा बाधा नहीं डाल सकता
  • १२. प्रवृत्ति-निवृत्तिका सदुपयोग और कर्म करनेकी आसक्तिका त्याग
  • १३. कर्मकी शुद्धिके लिये भाव और संकल्पकी शुद्धि आवश्यक
  • १४. सुखभोगकी इच्छाओंके नाशका उपाय-विचार और प्रेम
  • १५. अपनी उन्नति या प्रसन्नताका हेतु किसी अन्यको न मानना
  • १६. विवेक, विश्वास और प्रेमके आदर और सदुपयोगका वर्णन
  • १७. मनुष्य-शरीरकी महिमा तथा भगवान‍्के साथ एकताका वर्णन
  • १८. मान्यताके अनुसार कर्तव्य-पालनके द्वारा मान्यतासे असंग होनेका प्रकार तथा अभिमानसे हानि
  • १९. पशु-पक्षी आदिसे मनुष्य-शरीरकी विशेषता
  • २०. गुणोंके अभिमानसे हानि और उसके त्यागका महत्त्व
  • २१. प्रमाद, आलस्य और अकर्तव्यका तथा व्यर्थ चेष्टाका त्याग करके संयमपूर्वक कर्तव्यपरायणता
  • २२. साधनमें उत्साह और व्याकुलता दोनों रहना चाहिये
  • २३. स्वतंत्र साधनके लिये प्रेरणा और उसका स्वरूप
  • २४. साधनमें रुचि और प्रवृत्ति स्वाभाविक होनी चाहिये, कर्तव्य-कर्मको भगवान‍‍्का काम समझकर करें
  • २५. माने हुए सम्बन्धका त्याग और प्रभुके साथ विश्वासपूर्वक सम्बन्ध जोड़ना, इसपर गोपियोंका उदाहरण
  • २६. सबको अपना समझना या किसीको भी अपना न समझना
  • २७. दोषोंको छिपाना उनका पोषण करना है, दूसरेके दोष देखकर अपने दोषोंके दुःखको दबाना भूल है
  • २८. दोषोंके रहते हुए उनका दुःख न होनेका कारण
  • २९. अपनी योग्यता और सामर्थ्यसे अधिक खर्च करना तथा मान-बड़ाई आदिका सदुपयोग न करना भी असाधन है
  • ३०. जीवनमें परिवर्तन न होनेका कारण सुख-दुःखके जालमें फँसे रहना है, सम्मिलित कुटुम्बमें हरेक खर्च घरवालोंकी सम्मतिसे करना चाहिये
  • ३१. करने और भोगनेकी आसक्ति और उसके नाशका उपाय
  • ३२. शरीर और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदका उपाय, जानकारीके अनुसार जीवन और मान्यताके अनुसार कर्तव्य-पालन करना
  • ३३. सत्संग करनेकी रीति, उसके द्वारा साधन-निर्माण
  • ३४. राग-द्वेषका तथा व्यर्थ चिन्तन और चेष्टाका त्याग
  • ३५. संसारसे सम्बन्ध छोड़कर भगवान‍्को परमदयालु और पतित-पावन तथा अपनेको पतित जानकर भगवान‍्से सम्बन्ध स्वीकार कर लें
  • ३६. मनके साथ बालकका-सा व्यवहार करना चाहिये, दोषोंको मिटानेकी और निर्दोषता स्थापन करनेकी युक्ति
  • ३७. भगवान‍्की आवश्यकता सबको है, पर सुखभोगकी चाहके कारण वह दबी हुई है अतः चाहरहित होना जरूरी है
  • ३८. प्रेमास्पदके मनमें मन मिला देना ही प्रेम-प्राप्तिका साधन है, व्यापक प्रेम ही वास्तवमें प्रेम है, प्रेमके स्वरूपका वर्णन
  • ३९. किसीका भी बुरा चाहते रहनेसे प्रेम समभावसे और असीम नहीं होता, ‘बुरा चाहना क्या है’ इसका स्पष्टीकरण तथा समभावसे असीम प्रेम-प्राप्तिका साधन
  • ४०. शरीर-जाति-वर्ण-आश्रम-धन-सम्पत्ति आदिके साथ जो माना हुआ सम्बन्ध है उससे ही अच्छे-बुरे कर्म होते हैं, उसके त्यागके उपायका वर्णन, निष्काम भावका महत्त्व
  • ४१. सबसे सम्बन्ध होनेका कारण, उसको तोड़नेका और भगवान‍्से सम्बन्ध जोड़नेका साधन, अधिकार-लालसा का त्याग
  • द्वितीय भाग
  • १. अपनी निर्बलता और भगवान‍्की महिमाके ज्ञानसे भगवान‍्में प्रेम और विश्वास होता है
  • २. भगवान‍्की कृपाका अनुभव
  • ३. मनकी एकाग्रता
  • ४. देहाभिमानरहित प्रेमी भक्तका आचरण
  • ५. जीते हुए मर जानेका स्वरूप और भगवत्प्रेम-प्राप्तिका साधन
  • ६. मृत्युसे डरनेका कारण तथा मृत्युकी महिमा
  • ७. स्वाधीनता और पराधीनताका स्वरूप, भगवान‍्के प्रेमकी प्राप्ति
  • ८. मूर्त्तिपूजाका रहस्य तथा साधनका महत्त्व, अभिमानका सर्वथा त्याग, नामजपपर तुलसीदासजीका उदाहरण
  • ९. प्रेम, मोह और आसक्तिका भेद
  • १०. निष्कामताका महत्त्व, लौकिक और पारलौकिक उन्नतिकी एकता
  • ११. स्वप्नका रहस्य, ईश्वरविश्वासका और विवेकका महत्त्व
  • १२. ईश्वरके प्रेमी भक्तमें सांसारिक कामनाका अभाव और भक्तिका स्वरूप, नामजप और स्मरणका भेद
  • १३. शरणागतिका साधन, उसका स्वरूप एवं विश्वास और सम्बन्धका महत्त्व
  • १४. भगवान‍्के अवतारका हेतु और उनकी लीलाका रहस्य
  • १५. साधनमें सफलता न मिलनेका कारण और निष्कामताकी आवश्यकता, संकल्पोंके नाशका उपाय
  • १६. गोपीभावका रहस्य और उसके लिये सत्संगकी आवश्यकता
  • १७. मनुष्यके विकासका उपाय तथा चरित्रबल, विवेकबल और विश्वासबल इन तीनोंकी आवश्यकता, उनका महत्त्व और उनकी प्राप्तिका उपाय
  • १८. मोह और प्रेमका भेद, अपनी योग्यता, रुचि और विश्वासके अनुसार साधन निर्माण करनेकी युक्ति, भगवान‍्की महिमापर विश्वास, लक्ष्यपर दृष्टि रखनेकी आवश्यकता, असली जीवनका स्वरूप
  • १९. जगत‍्से सम्बन्ध होनेका कारण
  • २०. पुरुषत्वकी व्याख्या और मीराजीकी जीवगोस्वामीजीसे बातचीत कान्ताभावका स्वरूप
  • २१. शान्ति मिलनेका उपाय
  • २२. दुःखकी निवृत्तिका उपाय
  • २३. मन न रुकनेका कारण और उसे रोकनेका उपाय
  • २४. प्रेम-प्राप्तिका साधन-विश्वास और अपनापान
  • २५. भावदृष्टि और तात्त्विकदृष्टि
  • २६. वीर पुरुष और वीरताका स्वरूप
  • २७. निरन्तर भगवत्स्मृतिका उपाय
  • २८. दीनता और अभिमान मिटानेका उपाय
  • २९. अभिमानका कारण
  • ३०. इच्छाओंके नाशका उपाय
  • अन्तिम पृष्ठ

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