प्राय: मनुष्य अपना समय धन कमानेमें खर्च कर रहे हैं। परिवारके पोषणको ही विशेष महत्त्व देते हैं, इन कामोंमें पाप करते हुए भी नहीं हिचकते। मनुष्य-शरीर पाकर भी हमलोग अपना पतन कर रहे हैं, इतने पर भी कोई हमें मनुष्य कहे, यह उचित नहीं है। प्रत्यक्षमें आत्माका कल्याण हो, ऐसे काममें समय न लगाकर जो अनावश्यक कामोंमें समय बिताते हैं, दिन-रात पाप करते हैं, वे गड्ढा खोदकर मर रहे हैं, उनको धिक्कार है—ये विचार हैं उन महापुरुषके, जिनका हृदय लोगोंके कल्याणके लिये तड़पता था। उनका एक ही लक्ष्य था कि मनुष्य चेतन है, यदि यह अपनी पूरी शक्ति लगा दे तो क्षण-भरमें भगवत्प्राप्ति करके जन्म-मरणके चक्रसे छूटकर परम आनन्द और प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति तक कर सकता है। जिन महापुरुषके ये भाव रहे, उनका नाम है—श्रीजयदयाल गोयन्दका। ऐसे महापुरुषके अनुभवकी बातें, जो कि स्वर्ण अक्षरोंमें लिखने योग्य हैं तथा अपने जीवनमें उतारने योग्य हैं, उन बातोंका यहाँ संकलन हुआ है।