॥ श्रीहरि:॥

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एक महापुरुषके अनुभवकी बातें

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

प्राय: मनुष्य अपना समय धन कमानेमें खर्च कर रहे हैं। परिवारके पोषणको ही विशेष महत्त्व देते हैं, इन कामोंमें पाप करते हुए भी नहीं हिचकते। मनुष्य-शरीर पाकर भी हमलोग अपना पतन कर रहे हैं, इतने पर भी कोई हमें मनुष्य कहे, यह उचित नहीं है। प्रत्यक्षमें आत्माका कल्याण हो, ऐसे काममें समय न लगाकर जो अनावश्यक कामोंमें समय बिताते हैं, दिन-रात पाप करते हैं, वे गड्ढा खोदकर मर रहे हैं, उनको धिक्कार है—ये विचार हैं उन महापुरुषके, जिनका हृदय लोगोंके कल्याणके लिये तड़पता था। उनका एक ही लक्ष्य था कि मनुष्य चेतन है, यदि यह अपनी पूरी शक्ति लगा दे तो क्षण-भरमें भगवत्प्राप्ति करके जन्म-मरणके चक्रसे छूटकर परम आनन्द और प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति तक कर सकता है। जिन महापुरुषके ये भाव रहे, उनका नाम है—श्रीजयदयाल गोयन्दका। ऐसे महापुरुषके अनुभवकी बातें, जो कि स्वर्ण अक्षरोंमें लिखने योग्य हैं तथा अपने जीवनमें उतारने योग्य हैं, उन बातोंका यहाँ संकलन हुआ है।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • साधकोंके लिये बहुत ही महत्त्वकी बातें
  • सिद्धान्तकी अनमोल बातें
  • हे नाथ! मुझे दर्शन देने ही पड़ेंगे
  • जो कुछ होता है, परमात्माकी दृष्टिमें होता है
  • साधनमें खास बाधा—राग-द्वेष
  • भावके अनुसार स्थिति
  • पहले अपने दोष दूर करो
  • सेवाकी महिमा
  • भाव बदलनेसे संसार परमात्माके रूपमें दिखने लग जाता है
  • भगवान् हमारे सम्मुख खड़े हैं
  • गंगा-किनारे जप-ध्यान, सत्संग करना चाहिये
  • काम, क्रोध, लोभ आदिके नाशके लिये उपाय—भजन, सत्संग
  • भगवान् सदा हमारे साथ हैं, यह दृढ़ विश्वास रखो
  • मान, बड़ाई, प्रतिष्ठाका त्याग
  • पुरुषोंकी सीढ़ी-दर-सीढ़ी श्रेणियोंका वर्णन
  • नित्य नियमसे अपने घरमें स्वाध्याय, भगवत् चर्चा करें
  • मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा पतन करानेवाली हैं
  • सर्वत्र भगवान् को ही देखें
  • भगवान् कैसे मिलें—यह लालसा बढ़ायें
  • भगवत्प्रेमकी महिमा
  • अन्तिम पृष्ठ

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