॥ श्रीहरि:॥

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दुःखोंका नाश कैसे हो?

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

एक बार श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका के मुखसे शब्द निकले कि ‘मैं आयुर्वेदको जानता हूँ तथा ज्योतिष शास्त्रको भी जानता हूँ पर उनके विषयमें यह नहीं कह सकता कि आप चाहे जो पूछ लें, परन्तु अध्यात्मविषयमें मैं आपको कहता हूँ कि आप जो चाहें पूछ सकते हैं। ये वचन कलकत्तामें गंगा-किनारे लोहाघाटपर कहे गये थे। इनसे उनकी अध्यात्मविषयक पूर्णताका परिचय हमें मिलता है। ऐसे अध्यात्मविषयके जानकार महापुरुषद्वारा समय-समयपर गीताभवन स्वर्गाश्रमकी स्थापनासे पूर्व वटवृक्षपर, गोरखपुरमें, बाँकुड़ामें सत्संगकी बहुत महत्त्वपूर्ण बातें कही गयीं तथा प्रवचन हुए, उन प्रवचनोंको लिखा गया था। उनका संकलन इस पुस्तकमें किया गया है। परमार्थके जिज्ञासु इन सत्संगकी बातोंसे विशेष आध्यात्मिक लाभ उठा सकें, इस भावसे यह संकलन हुआ है। आशा है इस पुस्तकसे परमार्थकी ओर चलनेवाले भाई-बहिन विशेष लाभ उठाकर हमें उत्साहित करेंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • महत्त्वपूर्ण बातें
  • गीताजीमें समताकी विशेषता
  • समयकी अमूल्यता
  • निरन्तर चिन्तन करें
  • अपनी आवश्यकता पैदा कर दो
  • भगवान‍्की गोदमें रहकर निर्भय रहना
  • सत्य, ब्रह्मचर्यका महत्त्व
  • प्रभुका आश्रय लेकर कर्तव्यकर्म करे
  • भगवान‍्के ध्यानमें मुग्ध रहें
  • सेवा, ईश्वर-चिन्तन तथा सत्संगसे लाभ
  • भगवत्प्राप्तिमें लगनकी आवश्यकता
  • साधनकी सीमा नहीं
  • परमात्माके लिये काम करना है
  • श्रद्धा, प्रेमकी प्रधानता
  • ममता त्यागें
  • वास्तविक शान्ति क्या है?
  • समताका व्यवहार करें
  • निरन्तर स्मरणसे अन्तकालमें स्मृति
  • ध्यानकी महिमा
  • भगवद्विषयक साधन पारस है
  • भक्तिका प्रचार भक्तोंका काम है
  • अपने सुधार एवं पतनमें मनुष्य स्वतन्त्र है
  • भगवत्प्राप्तिका महत्त्व
  • सबका उद्धार ही चाहें
  • पाप-प्रमादादि साक्षात् मृत्यु हैं
  • सब वस्तु रामजीकी
  • शिक्षाप्रद पत्र
  • विश्वजित् यज्ञ
  • अन्तिम पृष्ठ

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