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॥ श्रीहरि:॥
हिन्दी
ई – पुस्तकें
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/ दोहावली
दोहावली
लेखक
श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार
भाषा
हिन्दी/संस्कृत
पुस्तक पढ़ें
विषय-सूची
•
प्रथम पृष्ठ
•
नम्र निवेदन
•
ध्यान
•
रामनाम-जपकी महिमा
•
रामप्रेमके बिना सब व्यर्थ है
•
प्रार्थना
•
रामकी और रामप्रेमकी महिमा
•
उद्बोधन
•
तुलसीदासजीकी अभिलाषा
•
रामप्रेमकी महत्ता
•
रामविमुखताका कुफल
•
कल्याणका सुगम उपाय
•
श्रीरामजीकी प्राप्तिका सुगम उपाय
•
रामप्रेमके लिये वैराग्यकी आवश्यकता
•
शरणागतिकी महिमा
•
भक्तिका स्वरूप
•
कलियुगसे कौन नहीं छला जाता?
•
गोस्वामीजीकी प्रेम-कामना
•
रामभक्तके लक्षण
•
उद्बोधन
•
शिव और रामकी एकता
•
रामप्रेमकी सर्वोत्कृष्टता
•
श्रीरामकी कृपा
•
भगवान् की बाललीला
•
प्रार्थना
•
भजनकी महिमा
•
रामसेवककी महिमा
•
राममहिमा
•
रामभजनकी महिमा
•
रामप्रेमकी प्राप्तिका सुगम उपाय
•
रामप्राप्तिमें बाधक
•
रामकी अनुकूलतामें ही कल्याण है
•
श्रीरामकी शरणागतवत्सलता
•
प्रार्थना
•
रामराज्यकी महिमा
•
श्रीरामकी दयालुता
•
श्रीरामकी धर्मधुरन्धरता
•
श्रीसीताजीका अलौकिक प्रेम
•
श्रीरामकी कीर्ति
•
रामकथाकी महिमा
•
राममहिमाकी अज्ञेयता
•
श्रीरामजीके स्वरूपकी अलौकिकता
•
ईश्वर-महिमा
•
श्रीरामजीकी भक्तवत्सलता
•
सीता, लक्ष्मण और भरतके रामप्रेमकी अलौकिकता
•
भरत-महिमा
•
लक्ष्मणमहिमा
•
शत्रुघ्नमहिमा
•
कौसल्यामहिमा
•
सुमित्रामहिमा
•
सीतामहिमा
•
रामचरित्रकी पवित्रता
•
कैकेयीकी कुटिलता
•
दशरथमहिमा
•
सोरठा
•
जटायुका भाग्य
•
रामकृपाकी महत्ता
•
हनुमत् स्मरणकी महत्ता
•
बाहुपीड़ाकी शान्तिके लिये प्रार्थना
•
काशीमहिमा
•
शंकरमहिमा
•
शंकरजीसे प्रार्थना
•
भगवल्लीलाकी दुर्ज्ञेयता
•
प्रेममें प्रपंच बाधक है
•
अभिमान ही बन्धनका मूल है
•
जीव और दर्पणके प्रतिबिम्बकी समानता
•
भगवन्मायाकी दुर्ज्ञेयता
•
जीवकी तीन दशाएँ
•
सृष्टि स्वप्नवत् है
•
हमारी मृत्यु प्रतिक्षण हो रही है
•
कालकी करतूत
•
इन्द्रियोंकी सार्थकता
•
सगुणके बिना निर्गुणका निरूपण असम्भव है
•
निर्गुणकी अपेक्षा सगुण अधिक प्रामाणिक है
•
विषयासक्तिका नाश हुए बिना ज्ञान अधूरा है
•
विषयासक्त साधुकी अपेक्षा वैराग्यवान् गृहस्थ अच्छा है
•
साधुके लिये पूर्ण त्यागकी आवश्यकता
•
भगवत्प्रेममें आसक्ति बाधक है, गृहस्थाश्रम नहीं
•
संतोषपूर्वक घरमें रहना ही उत्तम है
•
विषयोंकी आशा ही दु:खका मूल है
•
मोह-महिमा
•
विषय-सुखकी हेयता
•
लोभकी प्रबलता
•
धन और ऐश्वर्यके मद तथा कामकी व्यापकता
•
मायाकी फौज
•
काम, क्रोध, लोभकी प्रबलता
•
काम, क्रोध, लोभके सहायक
•
मोहकी सेना
•
अग्नि, समुद्र, प्रबल स्त्री और कालकी समानता
•
स्त्री झगड़े और मृत्युकी जड़ है
•
उद्बोधन
•
गृहासक्ति श्रीरघुनाथजीके स्वरूपके ज्ञानमें बाधक है
•
काम-क्रोधादि एक-एक अनर्थकारक हैं फिर सबकी तो बात ही क्या है?
•
किसके मनको शान्ति नहीं मिलती?
•
ज्ञानमार्गकी कठिनता
•
भगवद्भजनके अतिरिक्त और सब प्रयत्न व्यर्थ हैं
•
संतोषकी महिमा
•
मायाकी प्रबलता और उसके तरनेका उपाय
•
गोस्वामीजीकी अनन्यता
•
प्रेमकी अनन्यताके लिये चातकका उदाहरण
•
एकांगी अनुरागके अन्य उदाहरण
•
मृगका उदाहरण
•
सर्पका उदाहरण
•
कमलका उदाहरण
•
मछलीका उदाहरण
•
मयूरशिखा बूटीका उदाहरण
•
अनन्यताकी महिमा
•
गाढ़े दिनका मित्र ही मित्र है
•
बराबरीका स्नेह दु:खदायक होता है
•
मित्रतामें छल बाधक है
•
वैर और प्रेम अंधे होते हैं
•
दानी और याचकका स्वभाव
•
प्रेम और वैर ही अनुकूलता और प्रतिकूलतामें हेतु हैं
•
स्मरण और प्रिय भाषण ही प्रेमकी निशानी है
•
स्वार्थ ही अच्छाई-बुराईका मानदण्ड है
•
संसारमें प्रेममार्गके अधिकारी बिरले ही हैं
•
कलियुगमें कपटकी प्रधानता
•
कपट अन्ततक नहीं निभता
•
कुटिल मनुष्य अपनी कुटिलताको नहीं छोड़ सकता
•
स्वभावकी प्रधानता
•
सत्संग और असत्संगका परिणामगत भेद
•
सज्जन और दुर्जनका भेद
•
अवसरकी प्रधानता
•
भलाई करना बिरले ही जानते हैं
•
संसारमें हित करनेवाले कम हैं
•
वस्तु ही प्रधान है, आधार नहीं
•
प्रीति और वैरकी तीन श्रेणियाँ
•
जिसे सज्जन ग्रहण करते हैं, उसे दुर्जन त्याग देते हैं
•
प्रकृतिके अनुसार व्यवहारका भेद भी आवश्यक है
•
अपना आचरण सभीको अच्छा लगता है
•
भाग्यवान् कौन है?
•
साधुजन किसकी सराहना करते हैं
•
संगकी महिमा
•
मार्ग-भेदसे फल-भेद
•
भलेके भला ही हो, यह नियम नहीं है
•
विवेककी आवश्यकता
•
कभी-कभी भलेको बुराई भी मिल जाती है
•
सज्जन और दुर्जनकी परीक्षाके भिन्न-भिन्न प्रकार
•
नीच पुरुषकी नीचता
•
सज्जनकी सज्जनता
•
नीच-निन्दा
•
सज्जनमहिमा
•
दुर्जनोंका स्वभाव
•
नीचकी निन्दासे उत्तम पुरुषोंका कुछ नहीं घटता
•
गुणोंका ही मूल्य है, दूसरोंके आदर-अनादरका नहीं
•
श्रेष्ठ पुरुषोंकी महिमाको कोई नहीं पा सकता
•
दुष्ट पुरुषोंद्वारा की हुई निन्दा-स्तुतिका कोई मूल्य नहीं है
•
डाह करनेवालोंका कभी कल्याण नहीं होता
•
दूसरोंकी निन्दा करनेवालोंका मुँह काला होता है
•
मिथ्या अभिमानका दुष्परिणाम
•
नीचा बनकर रहना ही श्रेष्ठ है
•
सज्जन स्वाभाविक ही पूजनीय होते हैं
•
भूप-दरबारकी निन्दा
•
छल-कपट सर्वत्र वर्जित है
•
जगत् में सब सीधोंको तंग करते हैं
•
दुष्ट-निन्दा
•
कपटीको पहचानना बड़ा कठिन है
•
कपटीसे सदा डरना चाहिये
•
कपट ही दुष्टताका स्वरूप है
•
कपटी कभी सुख नहीं पाता
•
पाप ही दु:खका मूल है
•
अविवेक ही दु:खका मूल है
•
विपरीत बुद्धि विनाशका लक्षण है
•
जोशमें आकर अनधिकार कार्य करनेवाला पछताता है
•
समयपर कष्ट सह लेना हितकर होता है
•
भगवान् सबके रक्षक हैं
•
लड़ना सर्वथा त्याज्य है
•
क्षमाका महत्त्व
•
क्रोधकी अपेक्षा प्रेमके द्वारा वशमें करना ही जीत है
•
वीतराग पुरुषोंकी शरण ही जगत् के जंजालसे बचनेका उपाय है
•
शूरवीर करनी करते हैं, कहते नहीं
•
अभिमानके वचन कहना अच्छा नहीं
•
दीनोंकी रक्षा करनेवाला सदा विजयी होता है
•
नीतिका पालन करनेवालेके सभी सहायक बन जाते हैं
•
सराहनेयोग्य कौन है
•
अवसर चूक जानेसे बड़ी हानि होती है
•
समयका महत्त्व
•
विपत्तिकालके मित्र कौन हैं?
•
होनहारकी प्रबलता
•
परमार्थप्राप्तिके चार उपाय
•
विवेककी आवश्यकता
•
विश्वासकी महिमा
•
बारह नक्षत्र व्यापारके लिये अच्छे हैं
•
चौदह नक्षत्रोंमें हाथसे गया हुआ धन वापस नहीं मिलता
•
कौन-सी तिथियाँ कब हानिकारक होती हैं?
•
कौन-सा चन्द्रमा घातक समझना चाहिये?
•
किन-किन वस्तुओंका दर्शन शुभ है?
•
सात वस्तुएँ सदा मंगलकारी हैं
•
श्रीरघुनाथजीका स्मरण सारे मंगलोंकी जड़ है
•
यात्राके समयका शुभ स्मरण
•
वेदकी अपार महिमा
•
धर्मका परित्याग किसी भी हालतमें नहीं करना चाहिये
•
दूसरेका हित ही करना चाहिये, अहित नहीं
•
प्रत्येक कार्यकी सिद्धिमें तीन सहायक होते हैं
•
नीतिका अवलम्बन और श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम ही श्रेष्ठ है
•
विवेकपूर्वक व्यवहार ही उत्तम है
•
नेमसे प्रेम बड़ा है
•
किस-किसका परित्याग कर देना चाहिये
•
सात वस्तुओंको रस बिगड़नेसे पहले ही छोड़ देना चाहिये
•
मनके चार कण्टक हैं
•
कौन निरादर पाते हैं?
•
पाँच दु:खदायी होते हैं
•
समर्थ पापीसे वैर करना उचित नहीं
•
शोचनीय कौन है
•
परमार्थसे विमुख ही अंधा है
•
मनुष्य आँख होते हुए भी मृत्युको नहीं देखते
•
मूढ़ उपदेश नहीं सुनते
•
बार-बार सोचनेकी आवश्यकता
•
मूर्खशिरोमणि कौन हैं?
•
ईश्वरविमुखकी दुर्गति ही होती है
•
जान-बूझकर अनीति करनेवालेको
•
उपदेश देना व्यर्थ है
•
जगत् के लोगोंको रिझानेवाला मूर्ख है
•
प्रतिष्ठा दु:खका मूल है
•
भेड़ियाधँसानका उदाहरण
•
ऐश्वर्य पाकर मनुष्य अपनेको निडर मान बैठते हैं
•
नौकर स्वामीकी अपेक्षा अधिक अत्याचारी होते हैं
•
राजाको कैसा होना चाहिये?
•
राजनीति
•
किसका राज्य अचल हो जाता है?
•
आज्ञाकारी सेवक स्वामीसे बड़ा होता है
•
मूलके अनुसार बढ़नेवाला और बिना अभिमान किये सबको सुख देनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है
•
त्रिभुवनके दीप कौन हैं?
•
कीर्ति करतूतिसे ही होती है
•
बड़ोंका आश्रय भी मनुष्यको बड़ा बना देता है
•
कपटी दानीकी दुर्गति
•
अपने लोगोंके छोड़ देनेपर सभी वैरी हो जाते हैं
•
साधनसे मनुष्य ऊपर उठता है और साधन बिना गिर जाता है
•
सज्जनको दुष्टोंका संग भी मंगलदायक होता है
•
कलियुगमें कुटिलताकी वृद्धि
•
आपसमें मेल रखना उत्तम है
•
सब समय समतामें स्थित रहनेवाले पुरुष ही श्रेष्ठ हैं
•
जीवन किनका सफल है?
•
पिताकी आज्ञाका पालन सुखका मूल है
•
स्त्रीके लिये पतिसेवा ही कल्याणदायिनी है
•
शरणागतका त्याग पापका मूल है
•
कलियुगका वर्णन
•
और चाहे जो भी घट जाय, भगवान् में प्रेम नहीं घटना चाहिये
•
कुसमयका प्रभाव
•
श्रीरामजीके गुणोंकी महिमा
•
कलियुगमें दो ही आधार हैं
•
भगवत्प्रेम ही सब मंगलोंकी खान है
•
दोहावलीके दोहोंकी महिमा
•
रामकी दीनबन्धुता
•
अन्तिम पृष्ठ
सम्बंधित ई-पुस्तकें
पार्वती मंगल
बरवै रामायण
जानकी मंगल
श्रीकृष्ण गीतावली
वैराग्य संदीपनी
विनय पत्रिका
हनुमानबाहुक
रामाज्ञा प्रश्न
कवितावली
गीतावली
पार्वती मंगल
बरवै रामायण
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श्रीकृष्ण गीतावली
वैराग्य संदीपनी
विनय पत्रिका
हनुमानबाहुक
रामाज्ञा प्रश्न
कवितावली
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बरवै रामायण
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