॥ श्रीहरि:॥

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दिव्य सुख की सरिता

श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

हिन्दी/संस्कृत

  • प्रथम पृष्ठ
  • ‘शिव’ का निवेदन
  • शक्ति और शक्तिमान‍्में अभेद
  • सब ब्रह्मरूप है
  • जीव भगवान‍्का सनातन अंश
  • वैराग्यवान् पुरुष ही सुखी
  • परम ध्येय
  • भगवत्प्रेममें महान् शक्ति
  • अनन्त और अपार भगवत्कृपा
  • भगवान् सर्वत्र, सदा और सबके
  • साधनमें शीघ्रताकी आवश्यकता
  • प्रभुके साथ नित्य सम्बन्ध
  • भोगपदार्थोंकी स्थिति
  • मनुष्य-शरीरकी महत्ता
  • परमात्मा नित्य पूर्ण और एकरस है
  • सच्चा अर्थ
  • सब कुछ भगवान‍्का
  • विवेकसे अनासक्ति
  • विचारोंके अनुसार मानवका स्वरूप
  • ममता ही बन्धन है
  • भगवान‍्की स्मृतिकी महत्ता
  • जीवनका उद्देश्य भगवान्
  • विनयकी महत्ता
  • संसार रंगमंच
  • भगवान‍्में जोड़नेवाले प्राणी-पदार्थ ही परम हितैषी हैं
  • विचार और आचरण
  • सर्वोत्तम सुखका साधन—संतोष
  • मनुष्य कर्मयोनि
  • भगवान‍्के स्वरूपभूत गुण
  • प्रेम त्यागमूलक है
  • जीवन भगवान‍्की क्रीड़ा
  • विवेकका सदुपयोग
  • व्यक्तिके सुधारसे ही विश्वका सुधार
  • भगवान् शिवका स्वरूप
  • भगवान् ही एकमात्र रस हैं
  • भगवान् एक, साधन अनेक
  • वस्तु और परिस्थितिका सदुपयोग
  • महात्मा या महापुरुष कौन?
  • सबमें निर्दोष भगवान् विराजित
  • अनर्थोंका मूल अहंकार
  • अन्तिम पृष्ठ

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