गीताप्रेसके संस्थापक परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका के एक ही लगन थी कि मानवमात्र इस भवसागरसे कैसे पार हो! मनुष्य जन्मता है, बड़ा होता है, सन्तान उत्पन्न करता है, मर जाता है। इस प्रकार पशुवत् जीवन बिताकर अन्य योनियोंमें चला जाता है। जीवनकालमें चिन्ता, शोक और दु:खोंसे घिरा रहता है। मनुष्यशरीर पाकर भी यदि चिन्ता और शोकमें डूबा रहा तो उसने मनुष्यशरीरका दुरुपयोग ही किया। यह शरीर चिन्ता-शोकसे ऊपर उठकर केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही प्रभुने कृपा करके दिया है। चिन्ता-शोक हमारी बेसमझीसे ही होते हैं। इसमें प्रारब्ध या भगवान् का कोई हाथ नहीं है। हम इस बातको समझ जायँ तो कभी भी चिन्ता-शोक नहीं हो सकते। जीवनमें सदाचार, सरलता, स्वार्थका त्याग बहुत सुगमतासे हो सकता है, चिन्ता-शोक सर्वथा मिट सकते हैं।