॥ श्रीहरि:॥

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चिन्ता शोक कैसे मिटें?

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

गीताप्रेसके संस्थापक परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका के एक ही लगन थी कि मानवमात्र इस भवसागरसे कैसे पार हो! मनुष्य जन्मता है, बड़ा होता है, सन्तान उत्पन्न करता है, मर जाता है। इस प्रकार पशुवत् जीवन बिताकर अन्य योनियोंमें चला जाता है। जीवनकालमें चिन्ता, शोक और दु:खोंसे घिरा रहता है। मनुष्यशरीर पाकर भी यदि चिन्ता और शोकमें डूबा रहा तो उसने मनुष्यशरीरका दुरुपयोग ही किया। यह शरीर चिन्ता-शोकसे ऊपर उठकर केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही प्रभुने कृपा करके दिया है। चिन्ता-शोक हमारी बेसमझीसे ही होते हैं। इसमें प्रारब्ध या भगवान् का कोई हाथ नहीं है। हम इस बातको समझ जायँ तो कभी भी चिन्ता-शोक नहीं हो सकते। जीवनमें सदाचार, सरलता, स्वार्थका त्याग बहुत सुगमतासे हो सकता है, चिन्ता-शोक सर्वथा मिट सकते हैं। 
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • स्वार्थत्याग एवं सेवाका महत्त्व
  • गीताजीकी महिमा
  • कल्याण-प्राप्तिके उपाय
  • चिन्ता, भय, शोक कैसे मिटें?
  • दु:खोंका विनाश एवं परमानन्दकी प्राप्ति
  • मनुष्यजन्मकी श्रेष्ठता
  • विश्वासघात कभी न करें
  • निरन्तर भगवान् को याद रखें
  • ईश्वरके भजनमें ही समयकी सदुपयोगिता
  • मनुष्यका कर्तव्य, धारण करने एवं त्यागनेयोग्य बातें
  • निष्काम कर्मयोग, भगवान् एवं महात्माकी एकता तथा श्रद्धाका विषय
  • गीताका एक श्लोक धारण करनेसे कल्याण
  • काम-दोषका निवारण
  • लोभका विवेचन
  • विशेष महत्त्वकी अनमोल बातें
  • वैराग्यकी महिमा
  • भगवान् की दयाका अनुभव करें
  • हमारी उन्नति कैसे हो?
  • निर्गुण और सगुणका ध्यान
  • अनमोल बातें
  • अन्तिम पृष्ठ

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