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॥ श्रीहरि:॥
हिन्दी
ई – पुस्तकें
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/ ई – पुस्तकें
/ भक्ति सुधा
भक्ति सुधा
भाषा
हिन्दी/संस्कृत
पुस्तक पढ़ें
विषय-सूची
•
प्रथम पृष्ठ
•
निवेदन
•
पूर्णपरात्पर भगवान् श्रीकृष्ण
+
प्रथम खण्ड—श्रीकृष्णलीला-दर्शन
+
श्रीकृष्ण-जन्म
•
श्रीनन्दराय और देवी नन्दरानीजीका परिचय
•
नन्दरानीके पुत्रदर्शनका उल्लास
+
श्रीकृष्णकी बालक्रीडा
•
जन्मोत्सवका उल्लास
•
बालरूपकी झाँकी
•
स्तुति-निवेदन
•
यशोदाजीको बालरूपके दर्शन
•
व्रजांगनाओंको माधुर्यरूप बालप्रभुका दर्शन
•
श्रीनन्दरानीद्वारा पय:पान कराना
•
श्रीव्रजेश्वरीका बालकृष्णके मनोरम अंगोंको देखकर मुग्ध होना
•
बालदर्शनसे श्रीनन्दरायजी आनन्दमूर्च्छित हो गये
•
भगवान्का जातकर्म-संस्कारोत्सव
•
श्रीगर्गजीद्वारा भगवान्का नामकरण-संस्कार
•
श्रीबलभद्रजी और कृष्णजीकी माधुर्यमयी शिशुलीला
•
नवनीतचोरी-लीला
•
मैया, मैं तो चन्द्र-खिलौना लैहों
•
नर्तन और वेणुवादन-लीला
+
भगवान्का मंगलमय स्वरूप
•
भगवान् सर्वथा अनुपमेय
•
भगवान्के मंगलमय दिव्य अंगोंकी शोभा
•
भगवान्के नेत्रोंकी अरुणिमा
•
भगवान्की दिव्य नासिकाकी शोभा
•
भगवान्के मधुर मन्द हासयुक्त मुखारविन्दकी शोभा
•
दिव्य विग्रहके अनुलेपनकी शोभा
•
भगवान्का दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य-माधुर्य
•
भगवान्के कटितटकी शोभा
•
भगवान्के चरणारविन्दोंकी शोभा
•
भगवान्के चरणचिह्नोंकी शोभा
•
भगवान्के युगलस्वरूपके चिन्तनसे अन्त:करणकी निर्मलता
+
‘साक्षान्मन्मथमन्मथ:’
•
भगवान् तथा कामदेवका संवाद
•
जीवात्मा और परमात्माका मिलन
•
आनन्दकी अभिलाषा
•
भक्तियोगके विधानके लिये भगवान्का अवतरण
•
भक्तिका ज्ञानरूपमें परिणमन
+
श्रीवृन्दावनमें वर्षा और शरद्
•
श्रीमद्भागवतमें वर्णित वर्षा एवंशरद्-ऋतुकी शोभा
•
श्रीरामचरितमानसमें वर्षा एवं शरद्-ऋतुका वर्णन
+
वेणुरव
•
वेणुवादन—भगवान्की मंगलमयी लीला
•
वेणुध्वनि-श्रवणका विलक्षण प्रभाव
+
किरातिनियोंका स्मररोग
•
भगवत्सम्बन्धसे तृष्णा, काम आदि भी भूषण बन जाते हैं
+
वेणुगीत
•
भगवान्के श्रीचरणोंमें अनुराग होना लोकोत्तर सौभाग्य है
•
भगवान्का वृन्दावन-आगमन
•
श्रीवृन्दारण्यकी शोभा
•
अदृश्य वस्तुकी सत्ताका दृष्टान्त
•
वृन्दावनमें भगवान्का आतिथ्य
•
भगवान्के प्रवेशसे वृन्दावनधाम रसमय हो गया
•
भगवत्सम्मिलनके लिये उत्कण्ठाके उत्कर्षकी आवश्यकता
•
वेणु-कूजनका प्रभाव
•
भक्तिका स्वरूप
•
भगवान्का विग्रह फलात्मक है, साधन नहीं
•
बाह्य रमण और आन्तर रमण
•
मनोमयी प्रतिमाका वैशिष्टॺ
•
भक्तकी भावनाके अनुसार ही भगवान्का स्वरूपधारण
•
अमलात्मा महायोगीन्द्र भी भगवान्के लोकोत्तर माधुर्यसे मुग्ध हो जाते हैं
•
भगवान्में सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभयविध शृंगारकी एक कालमें प्रतिष्ठा
•
भगवान्के अंगसंगसे ही भूषणोंकी शोभा
•
भगवान्द्वारा माधुर्यभावयुक्त विचित्रवेश धारण करना
•
भगवान्द्वारा मयूरपिच्छ-धारण
•
भगवान्द्वारा कानोंमें कर्णिकार-धारण
•
पीताम्बरधारणका रहस्य
•
भगवान्के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती-मालाकी शोभा
•
भगवान्की भूषणमयी शोभा
•
वेणुवादन
•
रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी लीला भी रसस्वरूप है
•
भगवान्के जन्म-कर्म बन्धनकारक नहीं हैं
•
प्रथम भगवान्का भक्तमें रमण, अनन्तर भक्तका भगवान्में रमण
•
भगवान्का आत्माभिरमण
•
भगवान्के गुणगणोंके श्रवणसे अन्त:करणमें भगवान्का प्राकटॺ
•
भगवान् पूर्ण स्वतन्त्र भक्त पूर्ण परतन्त्र
•
शरणागतिका स्वरूप
•
भक्तमें स्वातन्त्र्य और भगवान्में पारतन्त्र्य
•
भगवद्धाम वृन्दावनकी अद्भुत शोभा
•
भगवान्के चरणस्पर्शसे वृन्दावनकी भूमि सौभाग्यशालिनी हो गयी
•
वृन्दाके आख्यानका रहस्य
•
वेणुरव-श्रवणका प्रभाव
•
वेणुरवमें भगवान्का स्वरूप तथा उनकी लीला प्रतिष्ठित है
•
वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा हैं
•
इन्द्रियवानोंकी यही लालसा कि प्रभु इन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों
•
ध्यान लगानेकी रीति
•
व्रजांगनाओंका उपालम्भनयुक्त मनोभाव
•
आसक्तिकी महिमासे गोपांगनाओंको श्रीकृष्ण-बलरामके मनोहरभाव-युक्त दर्शनकी अनुभूति
•
गोपांगनाओंद्वारा वेणु आदिके प्रति ईर्ष्याभाव
•
वृन्दावनका सौभाग्य
•
वेणुनादसे आकृष्ट मयूरोंका नर्तन
+
चीरहरण
•
श्रुतियाँ ही व्रजकुमारियाँ बनीं
•
श्रुतियोंके दो भेद
•
दण्डकारण्यनिवासी मुनिगण भी गोपकुमारियोंके रूपमें प्रकट हुए
•
गोपकुमारिकाओंद्वारा उत्तम वरकी प्राप्तिके लिये देवी कात्यायनीका आराधन
•
यमुनास्नानका माहात्म्य
•
कर्मयोग और भक्तियोगकी विलक्षणता
•
भगवान्का व्रजकुमारिकाओंके साथ परिहास
•
प्रेममयी कुमारिकाओंद्वारा अपने वस्त्रोंकी याचना
•
दुस्त्यज्य त्यागके कारण व्रजांगनाओंकी दिव्य महिमा
•
दोषानुसन्धान करनेपर भी गोपांगनाएँ मनमोहन श्रीकृष्णको भूल नहीं पातीं
•
सर्वव्यवधानशून्य निरावरण हुए बिना जीवकी कृतकृत्यता नहीं होती
•
सभी जीव भगवान्के परतन्त्र होते हैं
•
भगवान् ही सबके मुख्य पति हैं
•
अद्वैतसे सुन्दर द्वैत
•
श्रीकृष्ण-संस्पृष्ट वस्त्रोंको धारणकर व्रजांगनाएँ रसाक्रान्त हो उठीं
•
भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा ही भक्ति है
•
श्रीकृष्णलीला कृष्णके लिये ही है, किसी दूसरेके लिये नहीं
+
व्रजभूमि
•
व्रजभूमिका अद्भुत वैभव
•
नित्य-निकुंजकी श्रीवृन्दावनसे भी अधिक रसमयता
+
श्रीरासलीलारहस्य
•
श्रीरासपंचाध्यायीके वक्ता व्यास-पुत्र महाज्ञानी श्रीशुकदेवजी और श्रोता गर्भज्ञानी श्रीपरीक्षित् जी का माहात्म्य
•
भक्तोंके लिये तो एकमात्र श्रीहरिश्रवण ही परमावलम्ब है
•
श्रीमद्भागवतमें दस प्रकारसे भगवान्का कीर्तन किया गया है
•
भागवतमें दशमस्कन्ध सार है और उसका भी सारातिसार है रासपंचाध्यायी
•
रासपंचाध्यायी श्रीमद्भागवतका प्राण है
•
श्रीभगवान्के अवतारका प्रधान प्रयोजन—अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान करना
•
भगवान्के सगुण दिव्य मंगलविग्रहमें विशेष आकर्षण है
•
भगवान् विधिनिषेधातीत हैं
•
रासलीलाके श्रवण और कीर्तनके अधिकारीकी योग्यता
•
श्रीवृषभानुनन्दिनीके कलवाक् नामक शुककी कथा
•
‘भगवान्’ शब्दकी व्याख्या
•
रासपंचाध्यायीके प्रथम श्लोककी व्याख्या
•
रासलीलाका प्रयोजन
•
भगवत्साक्षात्कारके लिये भगवल्लीलाओंका श्रवण-कीर्तन अनिवार्य है
•
नेत्रोंके साफल्यका रहस्य
•
व्रजांगनाओंके विविध भेद
•
रासकी रात्रियोंकी विलक्षणता
•
भक्तोंके तीन भेद
•
भगवान्की रासलीला मुमुक्षुओंके लिये
•
रासपंचाध्यायीके दूसरे श्लोककी व्याख्या
•
रासपञ्चाध्यायीके दूसरे श्लोककी एक अन्य व्याख्या
•
दूसरे श्लोककी एक अन्यप्रकारकी व्याख्या
•
प्रेमी भक्तकी रक्षाके लिये भगवान् स्वयं ही अवतीर्ण होते हैं—एक दृष्टान्त
•
विवेककी महिमा
•
भगवान्का गोपांगनाओंको उपदेश
•
स्वधर्ममें निष्ठा होनेका उपाय
•
अपनी कुल-परम्पराका समादर आवश्यक है
•
कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयके लिये शास्त्रका ही प्रामाण्य है
•
शास्त्रानुमोदित आचरणके बिना शास्त्रज्ञान निष्फल है
•
जो हितका उपदेश करे, वह शास्त्र है
•
वेदोंकी अपौरुषेयता
•
समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं
•
प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पदमें ही होती है
•
परमात्मप्रभुका आश्रय लेनेसे प्रपंचकी सहज ही निवृत्ति हो जाती है
•
इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार—सभीका अवभासक सर्वसाक्षी परमात्मा ही है
•
आत्मसमर्पणरूप अद्वैतदर्शन ही सच्ची पूजा और उत्कृष्टतम भक्ति है
•
प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये
•
ब्रह्मज्ञानके अधिकारीका निर्णय
•
कर्म और उपासनाका समुच्चय
•
विषयचिन्तनसे दु:खकी प्राप्ति
•
चित्तमें ही सारा प्रपंच है—योगवासिष्ठका एक दृष्टान्त
•
लीलाके विकासके लिये नित्य अभिन्न श्रीवृषभानुदुलारी और रासेश्वर श्रीकृष्णका द्वैधीभाव
•
इन्द्रियोंको विषय-सेवन मत कराओ
•
प्रभुको एकमात्र आश्रय बना लेनेपर सारे विकार निवृत्त हो जाते हैं
•
इन्द्रियोंको तुष्ट करनेकी चेष्टासे तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है
•
सच्चा भगवत्प्रेमी वही है, जो शास्त्रका उल्लंघन नहीं करता
•
प्रभु-मिलनकी तीव्र उत्कण्ठा होना बड़े सौभाग्यकी बात है
•
साधन-कार्यमें श्रद्धा (उत्साह)-की बड़ी आवश्यकता है
•
भगवत्प्राप्तिका एकमात्र साधन—भगवत्सम्मिलनकी तीव्रतर अभिलाषा—एक दृष्टान्त
•
भगवान्द्वारा व्रजांगनाओंको आश्वासन
•
व्रजांगनाओंकी उच्चतम स्थिति
•
रासलीला परब्रह्मका नित्य लास्य है
•
जीवका परमपुरुषार्थ प्रभुकी प्राप्ति ही है
+
श्रीरासपंचाध्यायी
•
गोपियोंके गर्वापहरणके लिये भगवान् अन्तर्धान हो गये
•
गोपबालाओंका अन्तर्द्वन्द्व
•
रासेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर व्रजांगनाओंकी मनोदशा
•
श्रीकृष्णमय गोपियाँ भगवान्की चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं
•
भक्त और भगवान्—दोनोंकी विवशता
•
भगवदनुरक्त गोपियोंद्वारा भगवद्विस्मरणके लिये उनमें दोषानुसन्धान
•
भगवान्के अन्तर्धान होनेका हेतु—गोपियोंपर कृपा करना
•
भगवान् भक्तपराधीन हैं
•
लीलाविहारीकी लीलाओंने व्रजांगनाओंको स्ववश करके अपनी लीलाका सम्पादन कराया
•
भगवान्के लीलानुकरणसे गोपियाँ अपनेको ‘मैं श्रीकृष्ण ही हूँ’—ऐसा मानने लगीं
•
गोपरामाओंका प्रेमोन्माद
•
प्रेममें गुण-दोषकी परीक्षा या विवेकको स्थान नहीं है
•
प्रेमकी दृढ़ताका एक दृष्टान्त
•
आप्तकाम पूर्णकाम भी लीलास्वादनमें तत्पर रहते हैं
•
गोपांगनाओंके हृदयमें रहकर भगवान्ने उनकी रक्षा की
•
प्रेमोद्रेकमें व्यवधान सह्य नहीं होता
•
भक्तकी दृढ़ भावनासे भगवान् भक्तके अधीन हो जाते हैं
•
गोपियोंकी प्रेमसमाधि भग्न होनेपर वे श्यामसुन्दरको पुकारने लगीं
•
गोपाङ्गनाओंका प्रेमविह्वल हो वृक्षों-वनस्पतियोंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना तथा उत्तर न मिलनेपर दोषानुसन्धान करना
•
गोपांगनाओंका कुरबक-अशोक आदिसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना
•
गोपांगनाओंका तुलसी आदिसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना
•
व्रजांगनाओंद्वारा तुलसीमें दोषानुसन्धान
•
भगवान्की पूजामें भावका प्राधान्य है, प्रचुर उपचारोंका नहीं
•
भगवान्का सौन्दर्य-माधुर्य स्वयं भगवान्को भी विस्मयमें डाल देता है
•
प्रेमोन्मादिनी गोपांगनाओंका आम्र, प्रियाल आदि वृक्षोंसे मनमोहन श्यामके विषयमें पूछना और उत्तर न मिलनेपर उनपर असूया भाव रखना
•
व्रजांगनाओंका प्रेमोन्माद
•
गोपांगनाओंद्वारा पृथ्वीसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना
•
अघासुरकी मुक्ति
•
मानसी-आराधनाकी महिमा
•
निकुंजस्थ माधुर्यनिधि श्यामसुन्दरकी श्रेष्ठता—एक रोचक दृष्टान्त
•
भगवान्की लोकोत्तर अलकावलीका माधुर्य
•
व्रजांगनाओंका वियोगिनी हरिणीसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना
•
गोपांगनाओंका सर्वातिशय माहात्म्य
•
श्यामाश्यामके मनोहररूपकी बाँकी झाँकी
•
श्रीकृष्णको जिसने अपना सर्वस्व नहीं बनाया, वह सोचनीय है
•
गोपांगनाओंद्वारा हरिणियोंके सौभाग्यकी सराहना
•
अपने प्रियतमके दर्शनोंकी तीव्र उत्कण्ठा ही सच्ची प्रीति है
•
श्यामसुन्दरके दर्शनमें ही नेत्रोंके होनेका साफल्य
•
हरिणीके प्रति ईर्ष्याभाव
•
गोपांगनाओंका मनमोहनके स्वरूपका वर्णन करके वृक्षोंसे प्रश्न करना
•
लताओंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना
•
श्रीरासपंचाध्यायीके पठन, श्रवण एवं मननका फल—हृद्रोग—कामका सर्वथा विनाश
•
श्रीश्यामरसका आस्वादन होते ही अन्य रस नीरस हो जाते हैं
•
गोपांगनाओंद्वारा श्यामसुन्दरकी मधुर लीलाओंका अनुकरण
•
गोपियोंद्वारा शकटासुर-तृणावर्त-उद्धार आदि लीलाओंका अनुकरण
•
भगवान्को वशमें करनेका एकमात्र साधन—रागानुगा भक्ति
•
ऐश्वर्यभावसे भी अधिक माधुर्यभावकी महत्ता—लीलाका एक दृष्टान्त
•
श्रीराधिकाजीमें पूर्णतम माधुर्यका प्रकाश
+
द्वितीय खण्ड—देवोपासनातत्त्व
+
गणपति-तत्त्व
•
गणपति ब्रह्म ही हैं
•
शास्त्रद्वारा ही गणपतिके ब्रह्मत्वका परिज्ञान
•
गणेशजीके विविध नामों तथा आयुधों आदिका स्वरूप
•
गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं
•
सर्वविघ्नोंके विनाशक गणेशकी आदिपूज्यता
•
मरणासन्नावस्था तथा श्राद्ध आदिमें भी गणेश-स्मरण आवश्यक
•
क्या गणेशजी अनार्योंके देव हैं?
+
भगवान् सूर्य—हमारे प्रत्यक्ष देवता
•
गायत्री-उपासना सर्वदेवमय आदित्यकी उपासना है
+
श्रीशिव-तत्त्व
•
भगवान् शिव—समस्त प्राणियोंके विश्रामस्थान
•
विश्वका उत्पादक, पालक, संहारक—एक या अनेक?
•
एक तत्त्वका अनेक नाम-रूपोंमें परिणमन
•
संहारमें भी भगवत्कृपा
•
शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं
•
शिव-विष्णुका सर्वथा अभेद
•
शिवके सगुणस्वरूपकी मनोहरता एवं मंगलमयता
•
भगवान् शिव आशुतोष हैं
+
शिवसे शिक्षा
•
शिवकुटुम्बका वैचित्र्य
+
शिवलिङ्गोपासना-रहस्य
•
सच्चिदानन्द परमात्माका शिवशक्ति-रूपमें प्राकटॺ
•
शास्त्रनिषिद्ध विषयोंमें आनन्द और प्रेम दोष है, हेय है
•
शुद्ध प्रेम ही शुद्ध काम है
•
शिव-शक्तिमें ही लिंगयोनि-भावकी कल्पना
•
ईश्वरभाव मायासे आवृत और शिवभाव अनावृत है
•
ज्योतिर्लिङ्गका स्वरूप
•
शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं
•
शिवलिंग योनिरूपा कुण्डलिनीसे परिवेष्टित
•
लिंगपूजनसे भुक्ति एवं मुक्ति
•
लिंगयोनिभाव ही अर्धनारीश्वर
•
कामनाभेदसे लिंगके विविध भेद
•
बाण और नार्मद लिंगकी परीक्षा
•
एक ही परमात्माके अनेक नाम
•
शिवको तामसदेवता कहना अनभिज्ञता
•
भगवान् शिव रसमय, कल्याणमय
+
श्रीविष्णु-तत्त्व
•
अनेक ईश्वरका मानना युक्तिविरुद्ध
•
जगत्पालनके लिये भगवान् विष्णुमें सर्वातिशायी ऐश्वर्य
•
भगवान्का स्थूल विराट् स्वरूप
•
भगवान्के आभूषणों एवं आयुधोंका रहस्य
•
भगवद्धाम
+
श्रीभगवती-तत्त्व
•
महाचिति भगवतीमें सम्पूर्ण विश्व भासित
•
महाचिति ही भगवती, आत्मा, पुरुष,ब्रह्म आदि शब्दोंसे व्यवहृत
•
भगवती मायारूपा नहीं है
•
मायाविशिष्ट ब्रह्म ही भगवती है
•
शक्तिका खण्डन
•
शक्ति-समर्थन
•
मायारूपिणी भगवती
•
माया और अविद्या
•
मायाकी अनिर्वचनीयता
•
तान्त्रिक दृष्टिमें शक्ति
•
प्रकृतिकी सत्ता
•
भगवती और मायाका वैलक्षण्य
•
रात्रिरूपिणी
•
चण्डी
•
नवार्णमन्त्रार्थ
•
प्रथम चरित्र
•
उत्तर चरित्र
•
‘देवीसूक्त’ में भगवतीका स्वरूप
•
भगवतीकी विविध विभूतियाँ
•
भगवती और सृष्टि
•
मूर्तिरहस्य
•
दशमहाविद्या
•
(२) तारा
•
(४) भुवनेश्वरी
•
(५) छिन्नमस्ता
•
(९) मातङ्गी
•
(१०) कमला
•
पूजारहस्य
•
पुरुषरूपिणी
•
शिवपरात्पर
•
ब्रह्मजाया
•
भगवतीकी ब्रह्मरूपता
+
गायत्री-तत्त्व
•
त्रिपदा गायत्री
+
शक्तिका स्वरूप
•
भगवती ही निखिल प्रपंचकी निर्मात्री
+
माँके श्रीचरणोंमें
•
कातर प्रार्थना
•
सांसारिक मोह-ममताका परिणाम
•
मोहकी विचित्र महिमा
•
माँ ही एकमात्र शरण
•
दीनजनोंपर माँकी विशेष कृपा
•
माँकी कृपासे ही माँका स्वरूपबोध
•
स्वकल्पित प्रपंच ही दु:खका हेतु है
•
कामनात्यागसे दृढ़बोधकी प्राप्ति
•
अखण्डबोधसे संसारकी नश्वरताका भान
•
देहभावनासे ही देहकी सत्ता और मनके कारण ही जगद्विभ्रम
+
शक्तिपीठ-रहस्य
•
इक्यावन शक्तिपीठ
•
वर्णमालाएँ
+
श्रीरामजन्म-रहस्य
•
भगवान्का आविर्भाव चार रूपोंमें
+
श्रीरामभद्रका ध्यान
•
भगवान्के विविध अंगों तथा आभूषणोंकी शोभा
+
भगवदवतारका प्रयोजन
•
भगवदवतरणके विभिन्न प्रयोजनोंके विविध अभिप्राय
+
भारतमें ही अवतार क्यों?
•
धर्माधर्मके निर्णयमें बुद्धिबल नहीं,शास्त्र ही प्रमाण है
•
शास्त्रोंमें संशोधनकी कल्पनानितान्त अल्पज्ञता
•
भारतवर्ष समस्त भूमण्डलकी नाभि है
+
अवतारमीमांसा
•
भगवान्का पूर्णावतार या अंशावतार
•
अवतारदेह और जीवदेहका पार्थक्य
+
बुद्धावतारका प्रयोजन
•
वेदोंको माननेवाला आस्तिक और उनकी निन्दा करनेवाला नास्तिक
+
निराकारसे साकार
•
परमात्मामें पारमार्थिक सत्तासे जन्माभाव और व्यावहारिक दृष्टिसे जन्मका भाव
•
साकाररूपमें प्रकट भगवान्के दर्शनमें विलक्षणता
•
साकाररूपमें किसी भी भावसे चित्त लगानेसे प्राणीका कल्याण
•
सगुणस्वरूपका चिन्तन सरल एवं सुगम
•
श्रुतियोंमें सगुण-साकाररूपकी अवधारणा
•
भगवद्विग्रहका उपादान
•
प्राकटॺके विषयमें विभिन्न अभिमतोंकी मीमांसा और निष्कर्ष
+
निर्गुण या सगुण
•
ध्याता, ध्यान और ध्येय
•
दिव्य स्वरूप-धारणका प्रयोजन
•
करणग्रामोंकी सार्थकता किसमें?
•
परमानन्दघन ब्रह्म अद्भुत रसमय है
•
द्रुतचित्तपर भगवान्का प्राकटॺ ही भक्ति है
•
भक्त और भगवान्का अभिन्न सम्बन्ध
•
भगवान्का स्वरूप ही प्रेम है
•
भगवान्में चित्त लगानेसे परम कल्याण
+
तृतीय खण्ड—भक्तितत्त्व
+
भगवत्प्राप्ति
•
भगवान्में उत्कट प्रीति होनेपर तत्क्षण ही भगवत्प्राप्ति
+
नामरूपकी उपयोगिता
•
नामरूपसे नामरूपातीत तत्त्वकी प्राप्ति
•
मनकी एकाग्रताके लिये सात्त्विक कर्म और ज्ञानका अवलम्बन अपेक्षित
•
नामरूपसे अतीत परब्रह्मकी दिव्यलीला-शक्तिके सहयोगसे नामरूपयुक्त सगुण-साकार रूपमें अभिव्यक्ति
•
सभी नामरूप भगवान्के ही हैं
•
भगवदर्थनामरूपकर्मसे भवबन्धनकी विमुक्ति
+
इष्टदेवकी उपासना
•
निन्दाका तात्पर्य अपने अभीष्टकी प्रशंसामें
•
अपने इष्टमें अनन्यता
•
शिव-विष्णुमें अभेद-बुद्धि
•
जिस रूपमें प्रीति हो, उस रूपकी उपासना करनी चाहिये
•
उपासनाके लिये अपनी कुल-परम्पराका समादर
•
कृपापरवश भगवान्द्वारा अनेक मंगलमय स्वरूपोंका धारण
•
श्रौत-स्मार्तप्रतिपादित स्वधर्मका सम्पादन परमेश्वरका आराधन है
+
मानसी आराधना
•
उपासनामें भावनाका प्राधान्य
+
सगुणोपासनामें सरलता
•
सगुणोपासना एवं निर्गुणोपासनाका तारतम्य
+
अव्यभिचार भक्तियोग
•
मानसी सेवा
•
चार प्रकारके भक्त
•
सविकल्पक और निर्विकल्पक ब्रह्म
•
ब्रह्म—अतिशयताकी कल्पनासे अतीत
+
सबसे सगे भगवान्
•
एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध ही स्थिर है
+
विभीषण-शरणागति
•
जीवभावसे मुक्त हुए बिना पूर्णस्वातन्त्र्य सम्भव नहीं
•
भगवान्के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है
•
सत्संकल्पकी महिमा
•
भगवान्की भक्तपरवशताका एक दृष्टान्त
•
भगवान्के अवतरणका हेतु—अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान
+
चतुर्विधा भजन्ते
•
ज्ञानी भक्त
•
जिज्ञासु भक्त
•
आर्त भक्त
•
अर्थार्थी भक्त
+
भगवच्छरणागतिसे ही गति
•
अनन्य भगवत्परायणताका एक दृष्टान्त
+
भगवान्का अवलम्बन अनिवार्य
•
स्वधर्मानुष्ठानसे कल्याणकी प्राप्ति
+
प्रेमतत्त्व
•
अन्त:करणकी सात्त्विकी वृत्ति ही प्रेम है
•
भगवान् ही प्रेमके उद्गम-स्थान किंवा प्रेमस्वरूप हैं
•
प्रेम, प्रेमी और प्रेमास्पदका अभेद सम्बन्ध
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भगवान् और प्रेम
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आत्मामें सर्वातिशायी प्रेम होता है
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उच्चकोटिका ज्ञान भी प्रेमके बिना सुशोभित नहीं होता
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रागानुगा प्रीतिके सम्पादनके लिये भगवान्का प्राकटॺ
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भगवत्कथामृत
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ब्रह्मसुख बृहत्तम सुख है
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भगवान् सबके परम प्रकाशक
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श्रवणकी महिमा
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श्रवणमें सभीका अधिकार
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प्रभुकृपा
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भगवत्कृपाके बिना मायासे पार होना असम्भव है
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भगवान्की शरण ग्रहण करनेसे ही उनके अनुग्रहकी प्राप्ति
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निर्बलका बल
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भगवान्का गुणगान भवरोगका सर्वश्रेष्ठ महौषध है
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निरन्तर भगवत्स्मरण सभीके लिये परम श्रेयस्कर है
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करुणालहरी
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प्रेमी भक्तका भगवान्के प्रति मधुर उपालम्भ
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गजेन्द्र-मुक्ति
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आर्तभक्तकी प्रार्थना
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संकल्प-बल
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परमात्मा ही जगत्के उपादान और निमित्त कारण
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संकल्पका प्राधान्य
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संकल्पके अनुसार ही क्रियाकी निष्पत्ति
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असत् संकल्पोंको त्यागनेकी रीति
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सत्-तत्त्वका प्रभाव
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संकल्पसिद्धिका बाधक—अविश्वास
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संकल्पका स्वरूप
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शुभसंकल्पकी ही भावना करें
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योगियोंका संकल्प-बल
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मनसे पापकर्मोंका परित्याग और अच्छे कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये
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बुरे कर्मोंके संकल्पोंको रोकना परमावश्यक
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सत्कर्म और उत्तम मन्त्रोंके जपसे संकल्पका बल दुगुना हो जाता है
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मन्त्रजपके अधिकारी-अनधिकारी
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ज्ञान और भक्ति
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ज्ञान बड़ा या भक्ति बड़ी
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भक्ति और ज्ञानका स्वरूप
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भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति
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भक्तिका अर्थ ज्ञान है
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ज्ञान नामकी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है
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वेदोंके दो काण्ड—कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड
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भक्तिका उत्कर्ष
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भक्ति और वेदान्त
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भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष तथा अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है
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भक्तिसे ज्ञानद्वारा परम तत्त्वकी प्राप्ति
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सगुणोपासना और निर्गुणोपासनाका तारतम्य
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सगुणोपासना सरल है
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जीवन्मुक्तकी भी भगवान्केभजनमें अभिरुचि
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भक्तिरसामृतास्वादन
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प्रेम वाणीका विषय नहीं
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विरक्तोंद्वारा भी भक्तिकी कामना
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भगवत्प्रेमके साधन
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चित्तद्रुतिसे भक्तिमें भेद
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परब्रह्मकी प्रेमास्पदता
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ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्में अभेद
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निर्गुण और सगुणका स्वरूप
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भगवान्के सभी गुण भक्तोपयोगी
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भगवान्की तीन शक्तियाँ
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बिम्बप्रतिबिम्बभाव
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अज्ञातज्ञापकत्व ही प्रमाणोंका प्रामाण्य है
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आचार्य श्रीमधुसूदनजी सरस्वती—व्यक्तित्व एवं कृतित्व
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क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा?
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विविध शंकाओंके युक्तियुक्तशास्त्रोक्त समाधान
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चतुर्थ खण्ड—ज्ञानतत्त्वदर्शन
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वेदान्तरससार
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मंगलाचरण
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वेदप्रामाण्य-तात्पर्यविमर्श
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ब्रह्मकी सच्चिदानन्दरूपता और जगत् की असच्चिदानन्दरूपता
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मायाकी अनिर्वचनीयता
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ज्ञानस्वरूपविमर्श
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भगवत्तत्त्व-प्रतिपादन
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अविक्रिय विज्ञानघन आत्माकी ब्रह्मरूपता
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श्रमबीज द्वैतमूल अज्ञानातीत आत्माकी स्वप्रकाश आनन्दरूपता
•
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निष्प्रपंच परमात्मामें कल्पित तादात्म्य-सम्बन्धसे प्रकृति तथा प्रपंचकी विद्यमानता
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वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कारसम्पन्न निरुद्धान्त:करणसे निरावरण ब्रह्मसाक्षात्कारकी सम्पन्नता
•
ब्रह्मात्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी बाधरूपता
•
तारतम्यशून्य अद्वयज्ञानस्वरूप तत्त्वकी निरतिशय बृहद् ब्रह्मरूपता
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सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार
•
महेश्वरकी महाशक्ति और उसकी अद्भुत चमत्कृति
•
वैदिक तथा अवैदिक दर्शनप्रभेद
•
चार्वाकमत-प्रतिपादन
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बौद्धमतविवेचन
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बौद्धमतप्रभेद
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जैनमतनिरूपण
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न्यायमतनिरूपण
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सांख्यमतप्रतिपादन
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योगमतनिरूपण
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मीमांसामतविवेचन
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वेदान्तमतप्रभेदप्रतिपादन
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श्रीमाध्वमतनिरूपण
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श्रीरामानुजमतनिरूपण
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श्रीनिम्बार्कमतनिरूपण
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श्रीवल्लभमतविवेचन
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शैवादि विविधमतविवेचन
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सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार
•
सुन्दोपसुन्दन्यायकी अप्रसक्ति, किंतु सोपानारोहक्रमकी प्रसक्ति
•
अद्वैतमें द्वैतान्तभावकी प्रसक्ति
•
द्वैतप्रपंचभगवदाश्रिता अनिर्वचनीयता शक्तिकी अद्भुत चमत्कृति
•
द्रष्टा आत्माकी दृश्यतादात्म्यापत्तिके कारण विविध वादोंकी प्रवृत्ति
•
परोवरीयक्रमके समादरसे समन्वयकी सिद्धि तथा वास्तव आत्माकी समुपलब्धि
•
तदभिमतविषयविशेषकी उपादेयता तथा तदतिरिक्तकी उपेक्षा—समन्वयकी स्वरूप-विधा
•
सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मकी निरावरण स्फूर्ति शिवादि पंचदेवोंमें एकातिरिक्त अन्योंकी निन्दा निज इष्टमें दृढ़ आस्था-सम्पादनकी विधा
•
कार्यब्रह्म, कारणब्रह्म और कार्यकारणातीत परब्रह्ममें पूर्व-पूर्वकी निन्दा उत्तरोत्तरकी उत्कृष्टताकी स्वस्थ दिशा
•
सत्ताभेदकी समीचीनता
•
कर्मसंन्यासकी शास्त्रसम्मतता
•
सर्वविध व्यवधानकी असहिष्णुता भगवत्प्रेमकी प्रगल्भता
•
स्वात्मसमर्पणसे ही भक्ति और भगवान्की पूर्णता
•
भगवद्-विग्रहकी व्यावहारिकता तथापि उपादानांशमें परमार्थता एवं निमित्तांशमें आकाशादिसे विलक्षणता
•
स्वरूपत: निर्गुण-निरपेक्ष-परमानन्दस्वरूप भगवत्तत्त्वके सगुण-साकाररूपसे प्रादुर्भावमें विशुद्ध सत्त्वात्मिका शक्तिकी निमित्तमात्रता
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अन्तिम पृष्ठ
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