॥ श्रीहरि:॥

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भजन संग्रह

हिन्दी/संस्कृत

इस संग्रहके प्रारम्भमें गोसाईं तुलसीदास, महात्मा सूरदास और संतवर कबीरदासके पदोंका संकलन है। भक्ति-साहित्यमें इन तीनों ही महात्माओंकी दिव्य बानियाँ अनुपम हैं, तदनन्तर अष्टछापके अनन्य भक्तों तथा हितहरिवंश, स्वामी हरिदास, गदाधर भट्ट, हरिराम व्यास आदि व्रज-रस-मधुकरोंकी सुललित गुंजार और नानक, दादूदयाल, रैदास, मलूकदास आदि संतोंके पदोंका संक्षिप्त संग्रह है। ग्रन्थके मध्यमें कुछ हरिभक्त देवियोंके पदोंका संग्रह है। जिनमें प्रमुख हैं—मीरा, सहजोबाई, वृन्दावनवासिनी बनीठनीजी, प्रतापबाला तथा युगलप्रियाजी। अन्तमें कुछ रामरँगीले भक्तोंकी वाणीका संकलन किया गया है, जिनमें एक दरियासाहबको छोड़कर शेष सभी मुसलमान हैं, जिनके बारेमें श्रीभारतेन्दुजीने कहा है—‘इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिन्दुन वारिये।
ग्रन्थकी समाप्ति नित्यलीलालीन परम श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारके परमोपयोगी सरस पदोंसे की गयी है। पाठकोंके सुविधार्थ पुस्तकमें दिये गये समस्त पदों (बानियों)-का वर्णमाला-क्रमसे संयोजन किया गया है, जिससे प्रेमी पाठक इच्छानुसार किसी एक वर्णाक्षर-क्रममें ही एकसे अधिक भक्त-कवियोंकी इन बानियोंका रसास्वादन कर सकें। सभी श्रद्धालु जनोंको इस ‘भजन-संग्रह’ से विशेष लाभ उठाना चाहिये। अन्तमें भगवान् से हमारी प्रार्थना है कि इन हरिभक्त कवियोंकी विमल बानियोंसे जगत् को सुख-शान्ति एवं आनन्दकी प्राप्ति हो।
  • प्रथम पृष्ठ
  • भूमिका
  • अकारादि-क्रमसे भजन-सूची
  • +
    तुलसीदास
    • गाइये गनपति जगबन्दन।
    • राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे।
    • राम राम रटु, राम राम रटु, राम राम जपु जीहा।
    • भरोसो जाहि दूसरो सो करो।
    • रुचिर रसना तू राम राम क्यों न रटत।
    • कलि नाम काम तरु रामको।
    • पावन प्रेम रामचरन कमल जनम लाहु परम।
    • नाहिन भजिबे जोग बियो।
    • यह बिनती रघुबीर गुसाईं।
    • रघुबर तुमको मेरी लाज।
    • ऐसी मूढ़ता या मनकी।
    • जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।
    • मेरो मन हरिजू! हठ न तजै।
    • हे हरि! कवन जतन भ्रम भागै।
    • ऐसो को उदार जग माहीं।
    • श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण-भव-भय दारुणं।
    • मैं हरि, पतित पावन सुने।
    • और काहि माँगिये, को माँगिबो निवारै।
    • कहु केहि कहिय कृपानिधे! भव-जनित बिपति अति।
    • मेरे रावरिये गति रघुपति है बलि जाउँ।
    • देव! दूसरो कौन दीनको दयालु।
    • रघुबर! रावरि यहै बड़ाई।
    • कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो।
    • रघुपति बिपति-दवन।
    • मनोरथ मनको एकै भाँति।
    • दीनको दयालु दानि दूसरो न कोऊ।
    • माधव, मोह-पास क्यों छूटै।
    • कुटुंब तजि सरन राम! तेरी आयो।
    • माधव! मो समान जग माहीं।
    • सकुचत हौं अति राम कृपानिधि क्यों करि बिनय सुनावौं।
    • रामचन्द्र रघुनायक तुमसों हौं बिनती केहि भाँति करौं।
    • हरि! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों।
    • ऐसे राम दीन-हितकारी।
    • लाज न आवत दास कहावत।
    • कौन जतन बिनती करिये।
    • जाउँ कहाँ, ठौर है कहाँ देव! दुखित दीनको।
    • तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी।
    • खोटो खरो रावरो हौं, रावरे सों झूठ क्यों
    • तऊ न मेरे अघ अवगुन गनिहैं।
    • जौ पै जिय धरिहौ अवगुन जनके।
    • केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिये।
    • ताहि ते आयो सरन सबेरे।
    • है प्रभु! मेरोई सब दोसु।
    • कैसे देउँ नाथहिं खोरि।
    • काहे ते हरि मोहिं बिसारो।
    • माधवजू मोसम मंद न कोऊ।
    • यों मन कबहूँ तुमहिं न लाग्यो।
    • ममता तू न गई मेरे मन तें॥
    • जाके प्रिय न राम बैदेही।
    • ते नर नरकरूप जीवत जग,
    • मन माधवको नेकु निहारहि।
    • सुनु मन मूढ़ सिखावन मेरो।
    • कबहूँ मन बिस्राम न मान्यो।
    • रामसे प्रीतम की प्रीति रहित जीव जाय जियत।
    • जो मन लागै रामचरन अस।
    • भज मन रामचरन सुखदाई॥ ध्रु०॥
    • अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।
    • मन पछितैहै अवसर बीते।
    • लाभ कहा मानुष-तनु पाये।
    • जानकी जीवनकी बलि जैहों।
    • जो मोहि राम लागते मीठे।
    • अस कछु समुझि परत रघुराया।
    • जागिये रघुनाथ कुँवर पंछी बन बोले॥
    • जागिये कृपानिधान जानराय, रामचन्द्र!
    • झूलत राम पालने सोहैं।
    • राम-पद-पदुम पराग परी।
    • सखि नीके कै निरखि कोऊ सुठि सुंदर बटोही।
    • मनोहरताको मानो ऐन।
    • बहुत दिन बीते सुधि कछु न लही।
    • भाई! हौं अवध कहा रहि लैहौं।
    • रघुपति! मोहिं संग किन लीजै?
    • बिनती भरत करत कर जोरे।
    • कर सर धनु, कटि रुचिर निषंग।
    • राघौ गीध गोद करि लीन्हौं।
    • पद-पद्म गरीबनिवाजके।
    • दीन-हित बिरद पुराननि गायो।
    • सत्य कहौं मेरो सहज सुभाउ।
    • कब देखौंगी नयन वह मधुर मूरति?
    • बैठी सगुन मनावति माता।
    • जानत प्रीति-रीति रघुराई।
    • रघुपति राजीवनयन, सोभातनु कोटिमयन॥
    • सखि! रघुनाथ-रूप निहारु।
    • मोकहँ झूठेहु दोष लगावहिं।
    • गोकुल प्रीति नित नई जानि।
    • हरिको ललित बदन निहारु!
    • टेरि कान्ह गोवर्धन चढ़ि गैया।
    • गोपाल गोकुल-बल्लभी-प्रिय, गोप गोसुत बल्लभं।
  • +
    सूरदास—नाम
    • रे मन, कृष्णनाम कहि लीजै।
    • है हरि नामको आधार।
    • ताते तुमरो भरोसो आवै।
    • जो तू रामनाम चित धरतौ।
    • जो सुख होत गोपालहि गाये।
    • जो पै रामनाम धन धरतो।
    • तुम्हरी कृपा गोबिंद गुसाँई हौं अपने अज्ञान न जानत।
    • जो हम भले-बुरे तौ तेरे।
    • करी गोपालकी सब होइ।
    • हरि हौं बड़ी बेरको ठाढ़ो।
    • दीनानाथ अब बार तुम्हारी।
    • नाथ मोहिं अबकी बेर उबारो।
    • अबकी टेक हमारी लाज राखो गिरधारी।
    • दीनन दुखहरन देव, संतन सुखकारी।
    • तुम तजि और कौन पै जाऊँ।
    • अब कैसे दूजे हाथ बिकाऊँ।
    • अबकी राखि लेहु भगवान।
    • अपनी भगति दे भगवान।
    • अपनेको को न आदर देय।
    • अबके माधव मोहि उधारि।
    • अब मोहि भीजत क्यों न उबारो।
    • ऐसो कब करिहो गोपाल।
    • ऐसे प्रभु अनाथके स्वामी।
    • कौन गति करिहौ मेरी नाथ।
    • जैसेहि राखौ तैसेहि रहौं।
    • नाथजू अबकै मोहि उबारो।
    • प्रभु मेरे अवगुन चित न धरो।
    • बंदौं चरन सरोज तुम्हारे।
    • बिनती जन कासों करै गुसाँई।
    • भजु मन चरन संकटहरन॥
    • माधव! मोहि काहेकी लाज?
    • सरन गयेको को न उबारॺो?
    • हमें नँदनंदन मोल लियो।
    • हरिसों ठाकुर और न जनको।
    • हरिको मीत न देखौं कोई।
    • तुम मेरी राखो लाज हरी।
    • तुम गोपाल मोसों बहुत करी।
    • हरि हौं सब पतितनको राव।
    • अब मैं नाच्यों बहुत गुपाल।
    • मो सम कौन कुटिल खल कामी।
    • सुने री मैंने निरबलके बल राम।
    • पतितपावन हरि बिरद तुम्हारो कौने नाम धरॺो।
    • प्रभु हौं सब पतितनको राजा।
    • तुम हरि साँकरेके साथी।
    • हैं प्रभु! मोहूँ तें बढ़ि पापी?
    • हरि हौं सब पतितनको नायक।
    • तुम कब मोसो पतित उधारॺो।
    • छाँड़ि मन हरि बिमुखन को संग।
    • भजन बिनु कूकर सूकर जैसो।
    • भगति बिनु बैल बिराने ह्वैहौ॥
    • रे मन जनम पदारथ जात।
    • सबै दिन गये बिषयके हेत।
    • सोई भलो जो रामहिं गावै।
    • सबै दिन नाहिं एक-से जात।
    • रे मन मूरख जनम गँवायो।
    • जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैं।
    • हरि बिन कौन दरिद्र हरै!
    • अजहूँ सावधान किन होहि।
    • ऐसी करत अनेक जनम गये मन संतोष न पायो।
    • कहा कमी जाके रामधनी?
    • कितक दिन हरि सुमिरन बिनु खोये।
    • मो सम पतित न और गुसाईं!
    • तुम्हरो कृष्ण कहत कहा जात।
    • हम भगतनके भगत हमारे।
    • जाको मनमोहन अंग करै।
    • अविगत गति कछु कहत न आवै।
    • दयानिधि तेरी गति लखि न परै।
    • अपुनपो आपुन ही बिसरॺो।
    • जागिये ब्रजराजकुँअर कमल कुसुम फूले।
    • जसोदा हरि पालने झुलावै।
    • जसुमति मन अभिलाष करै।
    • लालन हौं बारी तेरे या मुख ऊपर।
    • लालन तेरे मुखपर हौं बारी।
    • कहन लगे मोहन मैया मैया।
    • बरनों बाल-भेष मुरारि।
    • मेरो माई ऐसो हठी बालगोबिंदा।
    • मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी!
    • मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।
    • मो देखत जसुमति तेरे ढोटा अबहीं माटी खाई।
    • मैया री मोहिं माखन भावै।
    • जो तुम सुनहु जसोदा गोरी।
    • मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो।
    • जसोदा तेरो भलो हियो है माई।
    • नंदनँदन मुख देखो माई।
    • नटवर बेष काछे स्याम।
    • बिछुरत श्रीब्रजराज आज सखि, नैननिकी परतीति गई।
    • चले गये दिलके दामनगीर॥
    • ऊधो मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
    • ऊधौ इतनो कहियो जाई।
    • मनौं हौं ऐसे ही मरि जैहौं।
    • सँदेसो देवकी सों कहियो।
    • सुनहू गोपी हरिको संदेस।
    • मधुकर स्याम हमारे चोर।
    • ऊधो मन न भये दस बीस।
    • गोकुल सबै गोपाल उपासी।
    • हमरे कौन जोग ब्रत साधै?
    • निर्गुन कौन देसको बासी?
    • बिनु गुपाल बैरिन भई कुंजैं।
    • अब या तनहि राखि का कीजै।
    • कहाँ लौं कहिये ब्रजकी बात।
    • निसिदिन बरसत नैन हमारे।
    • मधुकर! इतनी कहियहु जाइ।
    • नैना भये अनाथ हमारे।
    • रुक्मिनि मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।
    • आजु हौं एक-एक करि टरिहौं।
    • वा पट पीतकी फहरान!
    • आज जो हरिहिं न सस्त्र गहाऊँ।
    • सबसों ऊँची प्रेम सगाई।
    • अब तो प्रगट भई जग जानी।
    • सोइ रसना जो हरिगुन गावै।
    • ऐसी प्रीतिकी बलि जाउँ।
    • जाको मन लाग्यो नंदलालहिं ताहि और नहिं भावे हो।
    • मोहन इतनो मोहि चित धरिये।
    • प्रीति करि काहूँ सुख न लह्यो।
    • नाहिन रह्यो हियमें ठौर।
    • हम न भईं बृंदाबन-रेनु।
    • अँखियाँ हरि दरसनकी भूखी।
    • अँखियाँ हरि दरसनकी प्यासी।
    • ऐसेहि बसिये ब्रजकी बीथिनि।
    • मोहि प्रभु तुमसो होड़ परी।
  • +
    कबीरदास
    • भजौ रे भैया राम गोबिंद हरी।
    • तू तो राम सुमर जग लड़वा दे।
    • जो जन लेहि खसमका नाऊँ तिनके सद बलिहारी जाऊँ।
    • मत कर मोह तू, हरि भजनको मान रे।
    • मन तोहे किहि बिध मैं समझाऊँ।
    • जन्म तेरा बातों ही बीत गयो।
    • तोरी गठरीमें लागे चोर बटोहिया का सोवै
    • कौन ठगवा नगरिया लूटल हो
    • रहना नहिं देस बिराना है।
    • बीत गये दिन भजन बिना रे!
    • माया महा ठगिनि हम जानी।
    • मैं केहि समुझावों सब जग अंधा॥
    • धुबिया जल बिच मरत पियासा
    • जागु पिआरी, अबका सोवै।
    • नैहरवा हमकाँ न भावै
    • हमन है इश्क मस्ताना हमनको होशियारी क्या?
    • कौन मिलावै मोहि जोगिया हो,
    • अबिनासी दुलहा कब मिलिहौ भगतनके रछपाल॥
    • प्रीति लगी तुम नाम की, पल बिसरैं नाहीं।
    • घूँघटका पट खोल री तोहे पीव मिलेंगे
    • मन लागो मेरो यार फकीरीमें
    • आई गवनवाँकी सारी उमिरि अबहीं मोरि बारी
    • हमका ओढ़ावै चदरिया चलती बिरिया।
    • या बिधि मनको लगावै, मनके लगाये प्रभु पावै॥
    • तनकी धनकी कौन बड़ाई।
    • ऐसी नगरियामें किहि बिधि रहना।
    • दरस दिवाना बावला अलमस्त फकीरा।
    • रस गगन गुफामें अजर झरै।
    • रमैया की दुलहिन लूटा बजार।
    • डर लागै औ हाँसी आवै अजब जमाना आया रे॥
    • बाबू ऐसो है संसार तिहारो, है यह कलि ब्यवहारा।
  • +
    हितहरिवंश
    • यह जु एक मन बहुत ठौर करि कहि कौने सचु पायो।
    • तातें भैया, मेरी सौं, कृष्ण-गुन-संचु।
    • मोहन लालके रँग राची।
    • रहौ कोउ काहू मनहि दियें।
    • प्रीति न काहु कि कानि बिचारै।
  • +
    स्वामी हरिदास
    • ज्योंहीं ज्योंहीं तुम राखत हौ त्योंहीं त्योंहीं रहियतु है हो हरि।
    • काहूको बस नाहिं तुम्हारी कृपा तें, सब होय बिहारी बिहारिनि।
    • हित तौ कीजै कमलनैनसों, जा हित आगे और हित लागो फीको।
    • तिनका बयारिके बस।
    • हरिके नामको आलस क्यों करत है रे काल फिरत सर साँधैं।
    • मन लगाइ प्रीति कीजै कर करवा सों, ब्रजबीथिन दीजै सोहिनी।
    • हरिको ऐसोइ सब खेल।
    • जौ लौं जीवै तौ लौं हरि भजु रे मन, और बात सब बादि।
    • प्रेमसमुद्र रूपरस गहिरे, कैसे लागै घाट।
    • गहौ मन सब रसको रस सार।
  • +
    गदाधर भट्ट
    • सखी, हौं स्याम रंग रँगी।
    • दिन दूलह मेरो कुँवर कन्हैया।
    • श्रीगोबिन्द पद-पल्लव सिर पर बिराजमान,
    • नमो नमो जय श्रीगोबिंद।
    • हरि हरि हरि हरि रट रसना मम।
    • है हरितें हरिनाम बड़ेरो ताकों मूढ़ करत कत झेरो॥ १॥
    • कबै हरि, कृपा करिहौ सुरति मेरी।
    • जयति श्रीराधिके सकलसुखसाधिके
    • जय महाराज ब्रजराज-कुल-तिलक
    • झूलत नागरि नागर लाल।
    • आजु ब्रजराजको कुँवर बनते बन्यो,
    • सुंदर स्याम सुजानसिरोमनि, देउँ कहा कहि गारी हो।
  • +
    नन्ददास
    • राम-कृष्ण कहिये उठि भोर।
    • जो गिरि रुचै तौ बसौ श्रीगोबर्धन, गाम रुचै तौ बसौ नँदगाम।
  • +
    कुम्भनदास
    • भगतकौ कहा सीकरी काम।
    • नैन भरि देख्यौ नंदकुमार।
    • हिलगिन कठिन है या मनकी।
    • जो पै चोंप मिलनकी होय।
  • +
    परमानन्ददास
    • ब्रजके बिरही लोग बिचारे।
    • कौन रसिक है इन बातन कौ।
    • जियकी साधन जिय ही रही री।
    • जसौदा तेरे भागकी कही न जाय।
    • मेरौ माई माधो सों मन लाग्यौ।
  • +
    कृष्णदास
    • जब तें स्याम सरन हौं पायौ।
    • बाल दसा गोपालकी सब काहू प्यारी।
    • मो मन गिरिधरछबिपै अटक्यौ।
  • +
    व्यास
    • राधा बल्लभ मेरौ प्यारौ।
    • वृंदाबन की सोभा देखे मेरे नैन सिरात।
    • नव चक्र चूड़ा नृपति मन साँवरौ,
    • हरिदासनके निकट न आवत प्रेत पितर जमदूत।
    • रसिक अनन्य हमारी जाति।
    • ऐसे ही बसिये ब्रजबीथिन।
    • जैये कौनके अब द्वार।
    • कहा-कहा नहिं सहत सरीर।
    • भजौ सुत, साँचे स्याम पिताहि।
    • धरम दुरॺो कलिराज दिखाई॥
    • साधन बैरागी जड़ बंग।
    • जो दुख होत बिमुख घर आये।
    • सुने न देखे भगत भिखारी।
    • जो सुख होत भगत घर आये।
    • हरि बिनु को अपनौं संसार।
    • कहत सुनत बहुतै दिन बीते भगति न मनमें आई।
    • परमधन राधे नाम अधार।
  • +
    श्रीभट्ट
    • मदनगुपाल, सरन तेरी आयौ।
    • ब्रजभूमि मोहिनी मैं जानी।
    • सेब्य हमारे हैं पिय प्यारे बृंदा बिपिन-बिलासी।
    • स्यामा स्याम पद पावैं सोई।
    • जुगुलकिसोर हमारे ठाकुर।
    • बलि-बलि श्रीराधे-नँदनँदना।
    • राधे, तेरे प्रेमकी कापै कहि आवै।
    • बसौ मेरे नैननिमें दोउ चंद।
  • +
    सूरदास मदनमोहन
    • नंदजू मेरे मन आनंद भयो, हौं गोबरधन तें आयौ।
    • प्रगट भई सोभा त्रिभुवनकी भानु गोपके आइ।
    • मेरे गति तुमहीं अनेक तोष पाऊँ।
    • मधुके मतवारे स्याम, खोलौ प्यारे पलकैं।
    • चलौ री, मुरली सुनिये, कान्ह बजाई जमुना तीर।
  • +
    नागरीदास
    • हमारै मुरलीवारौ स्याम।
    • चरचा करी कैसे जाय।
    • जो मेरै तन होते दोय।
    • दरपन देखत, देखत नाहीं।
    • हरि जू अजुगत जुगत करेंगे।
    • दुहुँ भाँतिनकौ मैं फल पायौ।
    • हमारी सब ही बात सुधारी।
    • भगति बिन हैं सब लोग निखट्टू।
    • किते दिन बिन बृंदाबन खोये।
    • ब्रजबासीतें हरिकी सोभा।
    • ब्रज-सम और कोउ नहिं धाम।
  • +
    भगवतरसिक
    • लखी जिन लालकी मुसक्यान।
    • परसपर दोउ चकोर दोउ चंदा।
    • बेषधारी हरिके उर सालैं।
    • इतने गुन जामें सो संत।
    • नमो नमो बृंदाबनचंद।
    • जय जय रसिक रवनीरवन।
  • +
    नारायण-स्वामी
    • सखि, मेरे मनकी को जानै।
    • जाहि लगन लगी घनस्यामकी।
    • मोहन बसि गयो मेरे मनमें।
    • मनमोहन जाकी दृष्टि परत, ताकी गति होत है और और।
    • प्रीतम, तू मोहिं प्रान ते प्यारौ।
    • करु मन, नंदनँदनको ध्यान।
    • स्याम दृगनकी चोट बुरी री।
    • नंदनँदनके ऐसे नैन।
    • या साँवरेसों मैं प्रीति लगाई।
    • बेदरदी तोहि दरद न आवै।
    • देख सखी नव छैल छबीलौ, प्रातसमय इततें को आवै।
    • मोपै कैसी यह मोहिनी डारी।
    • चाहै तू योग करि भृकुटीमध्य ध्यान धरि,
    • नयनों रे, चित-चोर बतावौ।
    • रूपरसिक, मोहन, मनोज-मन-हरन, सकल-गुन-गरबीले।
    • मूरख, छाड़ि बृथा अभिमान।
    • टेर सुनों ब्रजराज-दुलारे।
  • +
    ललितकिशोरी
    • मन पछितैहौ भजन बिनु कीने।
    • मुसाफिर, रैन रही थोरी।
    • अब का सोवै सखि! जाग जाग।
    • लटक लटक मनमोहन आवनि।
    • साधो, ऐसिइ आयु सिरानी।
    • लाभ कहा कंचन तन पाये।
    • मोहनके अति नैन नुकीले।
    • रे निरमोही, छबि दरसाय जा।
    • लजीले, सकुचीले, सरसीले, सुरमीलेसे
    • दुनियाके परपंचोंमें हम मजा नहीं कछु पाया जी।
    • मुरकि मुरकि चितवनि चित चोरै।
    • नैन चकोर, मुखचंदहूको बारि डारौं,
    • अब तौ तेरिय हाथ बिकानी।
    • मैं तुव पदतर रेनु रसीली।
    • कमलमुख खोलौ आजु पियारे।
    • अब कुलकानि तजे ही बनैगी।
  • +
    दादूदयाल
    • मेरे मन भैया राम कहौ रे॥ टेक॥
    • बिरहणिकौं सिंगार न भावै।
    • तौलगि जिनि मारै तूँ मोहिं।
    • संग न छाँडौं मेरा पावन पीव।
    • ऐसा राम हमारे आवै।
    • राम रस मीठा रे, कोइ पीवै साधु सुजाण।
    • सोई सुहागनि साँच सिंगार।
    • तब हम एक भये रे भाई।
    • इत है नीर नहावन जोग।
    • मेरा मेरा छोड़ गँवारा, सिरपर तेरे सिरजनहारा।
    • जगसूँ कहा हमारा।
    • आव पियारे मीत हमारे।
    • अरे मेरा अमर उपावणहार रे।
    • बटाऊ रे चलना आज कि काल।
    • कोइ जान रे मरम माधइया केरौ।
    • क्यों बिसरै मेरा पीव पियारा।
    • कबहूँ ऐसा बिरह उपावै रे।
    • जागि रे सब रैण बिहाणी।
    • अहो नर नीका है हरिनाम।
    • पंडित राम मिलै सो कीजै।
    • तूँ हीं मेरे रसना तूँ हीं मेरे बैना।
    • बाबा नाहीं दूजा कोई।
    • मन मुरिखा तैं यौंहीं जनम गँवायौ।
    • नूर रह्या भरपूर, अमीरस पीजिये।
    • तू साँचा साहिब मेरा।
    • सोई साध-सिरोमणि, गोबिंद गुण गावै।
    • हिंदू तुरक न जाणों दोइ।
  • +
    रैदास
    • गाइ गाइ अब का कहि गाऊँ।
    • ऐसो कछु अनुभव कहत न आवै।
    • जब रामनाम कहि गावैगा, तब भेद अभेद समावैगा॥ टेक॥
    • रामा हो जगजीवन मोरा।
    • अब हम खूब वतन घर पाया।
    • राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊँ।
    • देहु कलाली एक पियाला।
    • पार गया चाहै सब कोई।
    • यह अंदेस सोच जिय मेरे।
    • जो तुम तोरौ राम मैं नाहिं तोरौं।
    • सो कहा जानै पीर पराई।
    • आज दिवस लेऊँ बलिहारा।
    • कवन भगतिते रहै प्यारो पाहुनो रे।
    • अब कैसे छुटै नाम रट लागी॥ टेक॥
  • +
    मलूकदास
    • हरि समान दाता कोउ नाहीं।
    • सदा सोहागिन नारि सो, जाके राम भतारा।
    • अब तेरी सरन आयो राम॥ १॥
    • साँचा तू गोपाल, साँच तेरा नाम है।
    • कौन मिलावै जोगिया हो, जोगिया बिन रह्यो न जाय॥ टेक॥
    • तेरा मैं दीदार-दीवाना।
    • दरद-दिवाने बावरे, अलमस्त फकीरा।
    • हमसे जनि लागै तू माया।
    • नाम हमारा खाक है, हम खाकी बन्दे।
    • ऐ अजीज ईमान तू, काहेको खोवै।
    • गरब न कीजै बावरे, हरि गरब प्रहारी।
    • ना वह रीझै जप तप कीन्हे, ना आतमका जारे।
    • राम कहो राम कहो, राम कहो बावरे।
    • दीनबन्धु दीनानाथ, मेरी तन हेरिये॥ टेक॥
  • +
    चरनदास
    • सुन सुरत रँगीली हो कि हरि-सा यार करौ॥ टेक॥
    • टुक रंगमहलमें आव कि निरगुन सेज बिछी।
    • टुक निरगुन छैला सूँ, कि नेह लगाव री।
    • तरसै मेरे नैन हेली, राम मिलन कब होयगो॥ टेक॥
    • मो बिरहिनकी बात हेली, बिरहिन होइ जानिहै।
    • प्रेमनगरके माहिं होरी होय रही।
    • समझ रस कोइक पावै हो।
    • वह पुरुषोत्तम मेरा प्यार।
    • झूलत कोइ कोइ संत लगन हिंडोलने॥ टेक॥
    • साधो निंदक मित्र हमारा।
    • जिन्हैं हरिभगति पियारी हो।
    • गुरु हमरे प्रेम पियायौ हो।
    • अब घर पाया हो मोहन प्यारा॥ टेक॥
    • कोइ दिन जीवै तौ कर गुजरान।
  • +
    गुरु नानक
    • राम सुमिर, राम सुमिर, एही तेरो काज है॥ टेक॥
    • सब कछु जीवतकौ ब्यौहार।
    • हौं कुरबाने जाउँ पियारे, हौं कुरबाने जाउँ॥ टेक॥
    • मुरसिद मेरा मरहमी, जिन मरम बताया।
    • काहे रे बन खोजन जाई।
    • प्रभु मेरे प्रीतम प्रान पियारे।
    • अब मैं कौन उपाय करूँ॥
    • या जग मीत न देख्यो कोई।
    • जो नर दुखमें दुख नहिं मानै।
    • यह मन नेक न कह्यौ करै।
    • जगतमें झूठी देखी प्रीत।
  • +
    दरिया साहब
    • जाके उर उपजी नहिं भाई।
    • जो धुनियाँ तौ भी मैं राम तुम्हारा।
    • बाबल कैसे बिसरो जाई।
    • कहा कहूँ मेरे पिउकी बात।
    • रामनाम नहिं हिरदे धरा।
  • +
    मीराबाई
    • हरी तुम हरो जनकी भीर।
    • तुम सुणौ दयाल म्हाँरी अरजी॥
    • हमने सुणी छै हरी अधम उधारण।
    • स्याम मोरी बाँहड़ली जी गहो।
    • मैं तो तेरी सरण परी रे, रामा ज्यूँ जाड़े ज्यूँ तार।
    • हरि बिन कूण गती मेरी।
    • अब मैं सरण तिहारी जी, मोहि राखौ कृपा निधान॥ टेक॥
    • प्रभुजी मैं अरज करूँ छूँ मेरो बेड़ों लगाज्यो पार॥
    • थे तो पलक उघाड़ो दीनानाथ,
    • मीराको प्रभु साँची दासी बनाओ।
    • सुण लीजो बिनती मोरी, मैं शरण गही प्रभु तेरी।
    • प्यारे दरसन दीज्यो आय,
    • अब सो निभायाँ सरेगी, बाँह गहेकी लाज।
    • स्वामी सब संसारके हो साँचे श्रीभगवान॥
    • राम मिलण रो घणो उमावो नित उठ जोऊँ बाटड़ियाँ।
    • गली तो चारों बंद हुई, मैं हरिसे मिलूँ कैसे जाय॥
    • हे री मैं तो दरद दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय॥
    • नातो नामको जी म्हाँसूँ तनक न तोड़ॺो जाय॥
    • आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी॥
    • माई म्हारी हरिजी न बूझी बात।
    • घड़ी एक नहिं आवड़े, तुम दरसण बिन मोय।
    • दरस बिनु दूखण लागे नैन।
    • साँवरा म्हारी प्रीत निभाज्यो जी॥
    • स्याम सुंदरपर वार।
    • रमइया बिनु रह्यो न जाय।
    • प्रभुजी थे कहाँ गया नेहड़ो लगाय।
    • हे मेरो मनमोहना आयो नहीं सखी री॥ टेक॥
    • मैं बिरहणि बैठी जागूँ जगत सब सोवै री आली॥
    • पिय बिन सूनो छै जी म्हारो देस॥
    • कोई कहियौ रे प्रभु आवनकी।
    • मैं जाण्यो नाहीं प्रभुको मिलण कैसे होय री।
    • साजन सुध ज्यूँ जाणो लीजै हो।
    • बादळ देख डरी हो, स्याम! मैं बादळ देख डरी॥
    • बरसै बदरिया सावनकी, सावनकी मनभावनकी॥
    • डारि गयो मनमोहन पासी।
    • हरि बिन ना सरै री माई।
    • सुनी हो मैं हरि-आवनकी अवाज।
    • आओ मनमोहना जी जोऊँ थाँरी बाट।
    • आओ मनमोहन जी मीठा थाँरा बोल।
    • सोवत ही पलकामें मैं तो पलक लगी पलमें पिव आये।
    • राम मिलणके काज सखी मेरे आरति उरमें जागी री॥ १॥
    • गोबिंद कबहुँ मिलै पिया मेरा॥
    • मैं हरि बिन क्यों जिऊँ री माइ॥
    • तुम्हरे कारण सब सुख छोडॺा अब मोहि क्यूँ तरसावौ हौ।
    • करुणा सुणो स्याम मेरी।
    • हो जी हरि कित गये नेह लगाय॥
    • हो गये स्याम दूजके चंदा॥
    • पपइया रे पिवकी बाणि न बोल।
    • भवनपति तुम घर आज्यो हो।
    • पिया मोहि दरसण दीजै हो।
    • ऐसी लगन लगाय कहाँ (तूँ) जासी।
    • सखी मेरी नींद नसानी हो।
    • म्हारी सुध ज्यूँ जानो ज्यूँ लीजो।
    • हरि बिन क्यूँ जीऊँ री माय।
    • घर आँगण न सुहावे, पिया बिन मोहि न भावे॥ टेक॥
    • पिया, तैं कहाँ गयौ नेहरा लगाय।
    • बंसीवारा आज्यो म्हारे देस थारी साँवरी सुरत व्हालो बेस॥ १॥
    • बाला मैं बैरागण हूँगी।
    • इण सरवरियाँ री पाळ मीराबाई साँपड़े॥ १॥
    • म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा॥
    • साजन घर आओनी मीठा बोला॥ टेक॥
    • म्हारे जनम-मरण साथी थाने नहिं बिसरूँ दिन राती॥
    • मैं अपणे सैयाँ सँग साँची।
    • मैं तो साँवरेके रंग राची।
    • हमरो प्रणाम बाँकेबिहारीको।
    • (मेरे) नैनाँ निपट बंकट छबि अटके।
    • ऐसा प्रभु जाण न दीजै हो।
    • या मोहनके मैं रूप लुभानी।
    • पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे॥
    • माई री मैं तो लियो गोबिंदो मोल।
    • मन रे परसि हरिके चरण।
    • बड़े घर ताली लागी रे, म्हाँरा मनरी उणारथ भागीरे।
    • नंदनँदन बिलमाई, बदराने घेरी माई॥
    • नैणा लोभी रे, बहुरि सके नहिं आय।
    • होरी खेलत हैं गिरधारी।
    • मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥
    • तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे नागर नंद-कुमार।
    • जोसीड़ाने लाख बधाई रे अब घर आये स्याम॥
    • सहेलियाँ साजन घर आया हो।
    • म्हारा ओळगिया घर आया जी।
    • पियाजी म्हारे नैणाँ आगे रहज्यो जी॥
    • म्हारे घर होता जाज्यो राज।
    • चालाँ वाही देस प्रीतम पावाँ चालाँ वाही देस।
    • आओ सहेल्याँ रळी कराँ हे पर घर गवण निवारि।
    • रे साँवलिया म्हारै, आज रँगीली गणगोर छै जी।
    • तनक हरि चितवौ जी मोरी ओर।
    • जागो म्हाँरा जगपतिरायक हँस बोलो क्यूँ नहीं।
    • हरी मेरे जीवन प्रान-अधार।
    • सखी म्हारो कानूड़ो कळेजेकी कोर।
    • बसो मोरे नैननमें नँदलाल॥
    • जागो बंसीवारे ललना जागो मोरे प्यारे॥
    • स्याम! मने चाकर राखो जी।
    • आली! साँवरेकी दृष्टि मानो, प्रेमकी कटारी है॥ टेक॥
    • ऐसे पियै जान न दीजै हो॥
    • छोड़ मत जाज्यो जी महाराज॥ टेक॥
    • नहिं भावै थाँरो देसड़ लोजी रँगरूड़ो॥
    • सीसोद्यो रूठॺो तो म्हाँरो काँई कर लेसी,
    • मैं गिरधरके घर जाऊँ॥
    • तेरो कोई नहिं रोकणहार मगन होइ मीरा चली॥
    • श्रीगिरधर आगे नाचूँगी॥
    • राणाजी म्हे तो गोविंदका गुण गास्याँ।
    • राणाजी थे क्याँने राखो म्हाँसू बैर॥
    • मैं गोबिंद गुण गाणा॥
    • बरजी मैं काहूकी नाँहि रहूँ।
    • राणाजी म्हाँरी प्रीति पुरबली मैं काँई करूँ॥
    • राम-नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊँ ए माय।
    • या ब्रजमें कछु देख्यो री टोना॥
    • आली! म्हाँने लागे बृंदाबन नीको।
    • चलो मन गंगा जमुना तीर॥
    • मैं गिरधर रँग राती, सैयाँ मैं॥
    • फागुनके दिन चार होली खेल मना रे॥
    • मीरा रंग लागो राम हरी, औरन रंग अटक परी॥ १॥
    • सखी री लाज बैरण भई।
    • कुण बाँचै पाती, बिना प्रभु कुण बाँचै पाती॥
    • परम सनेही रामकी नित ओलूँ रे आवै।
    • हेली म्हास्यूँ हरि बिना रह्यो न जाय॥
    • मीरा मगन भई हरिके गुण गाय॥
    • भज ले रे मन गोपाल गुना॥
    • राम-नाम रस पीजै, मनुआँ राम नाम रस पीजै।
    • चालो अगमके देस काल देखत डरै।
    • नहिं ऐसो जनम बारंबार॥
    • भज मन चरणकँवल अबिनासी॥
    • लेताँ लेताँ रामनाम रे, लोकड़ियाँ तो लाजाँ मरे छै॥ १॥
    • रमइया बिन यो जिवड़ो दुख पावै।
    • कहो कुण धीर बँधावै॥ १॥
    • सूरत दीनानाथसे लगी, तूँ तो समझ सुहागण सुरता नार॥
    • करम गति टारे नाहिं टरे॥
    • देखत राम हँसे सुदामाकूँ देखत राम हँसे॥
    • मेरो मन रामहि राम रटै रे।
    • पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायो।
    • मोहि लागी लगन गुरु-चरणनकी।
    • लागी मोहिं राम खुमारी हो॥
    • री मेरे पार निकस गया सतगुर मारॺा तीर।
    • अब तौ हरि नाम लौ लागी।
  • +
    सहजोबाई
    • हमारे गुरु पूरन दातार।
    • सखी री आज आनँद देव बधाई।
    • हमारे गुरु बचननकी टेक।
    • नैनों लख लैनी साईं तैंडे हजूर।
    • बाबा काया नगर बसावौ।
    • आतम पूजा अधिक जान।
    • हमरे औषध नाँव धनीका।
    • ज्यों त्यों राम-नाम ही तारै।
    • सठ तजि नाँव-जगत सँग राचो।
    • भया हरि रस पी मतवारा।
    • मिलि गावो रे साधो यह बसंत।
    • जाग जाग जो सुमिरन करै।
    • मुकुट लटक अटकी मनमाहीं।
    • तेरी गति किनहुँ न जानी हो।
    • हम बालक तुम माय हमारी।
    • अब तुम अपनी ओर निहारो।
    • सुमिर-सुमिर नर उतरो पार, भौसागरकी तीछन धार॥ टेक॥
    • साधो भौसागरके माहिं काल होरी खेलाई॥ टेक॥
    • साधो मन मायाके संग, सब जग रंग रह्यो॥ टेक॥
    • हरि हर जप लेनी, औसर बीतो जाय।
    • हरि बिनु तेरो ना हितू, कोऊ या जग माहीं।
    • ऐसो बसंत नहिं बार-बार।
    • जगमें कहा कियो तुम आय।
  • +
    मंजुकेशी
    • आपन रूप परखिये आपै॥
    • जो चौदह रसको पहिचानै।
    • निर्मल मानसिक आवास॥
    • चंचल मनको बस करिय कसस॥
    • राम-रहसके ते अधिकारी।
    • अनुभवकी बात कोउ कोउ जानै॥
    • संयम साँचो वाको कहिये॥
    • चेतहु चेतन बीर सबेरे।
    • दर्शक दीप-दर्शन दूर॥
    • शांति एक आधार, सन्मुख॥
    • खेलत रामपूतरि माहिं।
    • बारे जोगिया, कवन बिपिन महँ डोलै?
    • आश्रम सुखद सुसंयम पाये॥
    • कामदगिरि ढिग डेरा कीजै॥
    • गजरिपु ब्रत सराहनयोग।
    • भुवन-बिच एकै दीप जरै।
    • देखेउ जो नीचे, हो रामा, कि ऊँचे चढ़िके री॥
    • चार जुगनू झलाझल झमकै॥
    • बामन बलिको छलिगे मीत।
    • धरतीमें पानी बास करै।
    • चौरासी मठके मठधारी।
    • मधुमाखी जरै नहिं दीपकपै।
    • सदय हृदयकी सरस कहानी।
    • भाव-भोगी हमारे नैना॥
    • रामधनीसे हेत नहीं जो।
    • छिन-सुख लागि मानुष मरै॥
    • निर्मल मनको एक स्वभाव॥
    • जो मानै मेरी हित सिखवन॥
    • भजन करिय निष्काम, हमारे प्यारे।
    • जागहु पंथी भयउ बिहाना॥
    • मानहु प्यारे, मोर सिखावन।
    • बिषयरस पान-पीक-सम त्याग॥
    • धाय धरो हरि चरण सबेरे॥
    • भावत रामहिं संयम इकरस॥
    • भावुक, भावमय भगवान।
    • कलि-प्रपंच-प्रसार, देखहु॥
    • रे मन, देश आपन कौन?
    • मारे रहो, मन॥
    • चतुर कहात सुंदर॥
    • जन हित राम धरत शरीर॥
    • कब हरि सुमिरनमें रस पैये॥
    • रामलगन माते जे रहते॥
    • हम न जाबैं कनक-गिरि-खोहा॥
    • सुख सजनी मिलै नहिं अग जगमें॥
    • गोसाईं मत, सुजन सगा सोइ आली॥
    • धावत राम बकैयाँ, हो रामा, धूरि भरे तन।
    • बन बिहरैं हमारे धनुषवारे॥
    • ‘राम गरीब-निवाज’ गुसाईं-बानी॥
    • आँगनमें खेलत रघुराई।
    • बाजी बँसुरिया हो रामा कि दियरा बारत री।
  • +
    बनीठनी
    • रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ।
    • हो झालौ दे छे रसिया नागर पनाँ।
    • पावस रितु बृन्दावनकी दुति दिन-दिन दूनी दरसै है।
    • उड़ि गुलाल घूँघर भई तनि रह्यो लाल बितान।
    • मैं अपनौ मनभावन लीनों॥
  • +
    प्रतापबाला
    • वारी थारा मुखड़ा री श्याम सुजान॥
    • मो मन परी है यह बान॥
    • चतुरभुज झूलत श्याम हिडोरें।
    • भजु मन नंद नंदन गिरधारी॥
    • लगन म्हारी लागी चतुरभुज राम॥
    • प्रीतम हमारो प्यारो श्याम गिरधारी है॥
  • +
    युगलप्रिया
    • श्रीगुरुदेव भरोसो साँचौ।
    • साधुनकी जूँठन नित लहिये, सुमिरत नाम हियेमें रहिये।
    • माई मोकों जुगलनाम निधि भाई।
    • सुभग सिंहासन रघुराज राम।
    • नैन सलोने खंजन मीन।
    • मिलन अनूठी प्यारे तिहारी॥
    • बाँकी तेरी चाल सुचितवनि बाँकी।
    • बीर अबीर न डारौ।
    • माई उमड़ि घुमड़ि घन आये।
    • ब्रजमंडल अमरत बरसै री।
    • राधा-चरनकी हूँ सरन।
    • जय राधे, श्रीकुंज बिहारिनि, बेगहि श्रीब्रजबास दीजिये।
    • नाथ अनाथकी सब जानै॥
    • प्रीतम रूप दिखाय लुभावै।
    • यातें जियरा अति अकुलावै॥
    • जो कीजत सो तौ भल कीजत, अब काहे तरसावै।
    • रूप किरिकिरी परी नैनमें, जियरा अति घबराय हो।
    • स्याम स्वरूप बसो हियमें, फिर और नहीं जग भावै री।
    • कोई दुख जानै नहिं अपनो, निज सुख होय गयो सपनौ।
    • नयननि नींद हिरानी, बोली कोयल बागमें।
    • होरी-सी हिय झार बढै री।
    • यह बिछुरन मेरे प्रान हरै री॥
    • साँवलियाकी चेरी कहौ री॥
    • मन तुम मलिनता तजि देहु।
    • दृग, तुम चपलता तजि देहु।
    • पापिनको सँग छाँड़ि जतन कर।
    • यह तन इक दिन होय जु छारा॥
    • बगुला भक्तन सौ डरिये री॥
    • सुनिये नाथ गरीब निवाज।
    • मेरे गति एक आप, दूजो कोऊ और ना।
    • बृंदाबन अब जाय रहूँगी, बिपति न सपनेहु जहाँ लहूँगी।
    • चरन चलौ श्रीवृंदावन मग, जहँ सुनि अलि पिक कीर॥
    • ब्रजलीला रस भावै अब तौ, श्रीगिरिराज अंकमें रहिये।
    • आओ प्यारे हृदय-सदनमें, पल कपाट दै राखूँगी।
    • मैं पाऊँ कृपाकरि मोहिनी, श्रीकुंज भवनकी सोहिनी।
    • बृंदाबन रस काहि न भावै।
    • जय श्रीजमुने कलि-मल-हारिनि!
    • ज्ञान शुभ कर्मको सुथल मिथिला धाम॥
    • मंगल आरति प्रिया प्रीतमकी।
  • +
    रामप्रिया
    • तू न तजत सब तोहि तजेंगे।
    • जब किंकिनी धुनि कान परी री॥
    • जय जयति जय रघुबंशभूषण राम राजिवलोचनम्।
    • जोई जल ब्यापक जहानको जननहार,
  • +
    रानी रूपकुँवरि
    • श्याम छबिपर मैं वारी वारी॥
    • राखत आये लाज शरणकी।
    • देखो री छबि नन्दसुवनकी।
    • बस गये नैनन माँहि बिहारी॥
    • मूरति मुहनियाँ राधिकाजूकी।
    • भज मन राधा गोपाल छोड़ो सब झगरौ॥
    • रसना क्यों न राम रस पीती।
    • अब मन कृष्ण कृष्ण कहि लीजे।
    • भजन बिन है चोला बेकाम।
    • हमारे प्रभु कब मिलिहैं घनश्याम।
    • हमपर कब कृपालु हरि हुइहौ।
    • करहु प्रभु भवसागरसे पार॥
    • प्रभुजी! यह मन मूढ़ न माने॥
    • बिहारी जू है तुम लौ मेरी दौर॥
    • जय जय श्रीकृष्णचन्द्र नंदके दुलारे॥
    • जय जय मोहन मदनमुरारी॥
    • जागहु ब्रजराज लाल मोर मुकुटवारे।
    • लागो कृष्ण-चरण मन मेरौ॥
    • नाथ मुहिं कीजै ब्रजकी मोर।
    • हे हरि ब्रजबासिन मुहिं कीजे॥
    • प्रभुके दो ही दास हैं साँचे॥
  • +
    रहीम
    • छबि आवन मोहनलालकी।
    • कमलदल नैननिकी उनमानि।
    • शरद-निशि-निशीथे चाँदकी रोशनाई।
    • कलित ललित माला वा जवाहर जड़ा था,
    • दृग छकित छबीली छेलराकी छरी थी,
    • कठिन कुटिल काली देख दिलदार जुलफें,
    • जरद बसनवाला गुलचमन देखता था,
    • तरल तरनि-सी हैं तीर-सी नोकदारैं,
    • भुजग जुग किधौं हैं काम कमनैत सोहैं,
    • पकरि परम प्यारे साँवरेको मिलाओ,
    • पट चाहै तन, पेट चाहत छदन मन,
  • +
    रसखानि
    • मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँवके ग्वारन।
    • या लकुटी अरु कामरियापर, राज तिहूँ पुरकौ तजि डारौं।
    • गावैं गुनी, गनिका, गन्धर्व औ सारद, सेष सबै गुन गावैं।
    • सेस, महेस, गनेस, दिनेस, सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं।
    • खंजन-नैन फँसे पिंजरा-छबि, नाहिं रहैं थिर कैसेहूँ माई!
    • कानन दै अँगुरी रहिबो, जबहीं मुरली-धुनि मन्द बजैहै;
    • आजु री, नन्दलला निकस्यो, तुलसी-बनतैं बनकैं मुसकातो।
    • धूरि-भरे अति सोभित स्यामजु, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
    • ब्रह्म मैं ढूँढॺौ पुरानन गानन, बेद-रिचा सुनि चौगुने चायन।
    • द्रौपदि औ गनिका, गज, गीध, अजामिलसों कियो सो न निहारो।
    • जा दिनतें निरख्यौ नँद-नंदन, कानि तजी घर बन्धन छूटॺो।
    • बेनु बजावत, गोधन गावत, ग्वारनके सँग गोमधि आयो।
    • बैन वही उनकौ गुन गाइ, औ कान वही उन बैन सों सानी।
  • +
    यारी साहब
    • बिरहिनी मंदिर दियना बार॥
    • बिन बंदगी इस आलममें, खाना तुझे हराम है रे!
    • दिन दिन प्रीति अधिक मोहि हरिकी।
    • दोउ मूँदके नैन अन्दर, देखा, नहिं चाँद सूरज दिन रात है रे!
    • हमारे एक अलह प्रिय प्यारा है।
    • गुरुके चरनकी रज लैके, दोउ नैननके बिच अंजन दीया।
    • हौं तो खेलौं पियासँग होरी।
    • झिलमिल-झिलमिल बरसै नूरा, नूर-जहूर सदा भरपूरा।
    • रसना, राम कहत तैं थाको।
    • निर्गुन चुनरी निर्बान, कोउ ओढ़ै संत सुजान॥
    • आरति करो मन आरति करो।
    • जोगी जुगति जोग कमाव।
    • मन मेरो सदा खेलै नटबाजी, चरन कमल चित राजी॥
    • मन ग्वालिया, सत सुकृत तत दुहि लेह॥
    • चंद तिलक दिये सुंदर नारी, सोइ पतिबरता पियहि पियारी।
    • तू ब्रह्म चीन्हो रे ब्रह्मज्ञानी।
    • उरध मुख भाठी, अवटौं कौनी भाँति।
    • राम रमझनी यारी जीवके॥
    • सतगुरु है सत पुरुष अकेला, पिंड ब्रह्माण्डके बाहर मेला॥
    • सुन्नके मुकाममें बेचूनकी निसानी है,
    • उड़ु रे उड़ु बिहंगम चढ़ु अकास।
    • गयो सो गयो बहुरि नहिं आयौ॥
    • एक कहो सो अनेक ह्वै दीसत, एक अनेक धरे है सरीरा।
    • देखु बिचारि हिये अपने नर, देह धरो तौ कहा बिगरो है।
    • आँखी सेती जो भी देखिये, सो तो आलम फ़ानी है।
    • जहँ मूल न डार न पात है रे, बिन सींचे बाग सहज फूला।
    • जबलग खोजै चला जावै, तबलग मुद्दा नहिं हाथ आवै।
    • अंधा पूछे आफ़ताबको रे उसे किस मिसाल बतलाइये जी?
    • हम तो एक हुबाब हैं रे, साकिन बहरके बीच सदा।
    • आबके बीच निमक जैसे, सबलो है येहि मिलि जावै।
    • गगन गुफामें बैठिके रे, उलटिके अपना आप देखै।
    • गगन-गुफामें बैठिके रे, अजपा जपै बिन जीभ सेती।
  • +
    खुसरो
    • बहुत रही बाबुल घर दुलहिन, चल तेरे पी ने बुलाई।
  • +
    दरिया साहब (मारवाड़वाले)
    • कहा कहूँ मेरे पिउकी बात! जोरे कहूँ सोइ अंग सुहात।
    • जाके उर उपजी नहिं भाई! सो क्या जानै पीर पराई॥
    • जो धुनिया तौ भी मैं राम तुम्हारा।
    • आदि अंत मेरा है राम, उन बिन और सकल बेकाम॥
    • बाबुल कैसे बिसरा जाई?
    • पतिब्रता पति मिली है लाग, जहँ गगन-मँडलमें परमभाग॥
    • संतो कहा गृहस्थ कहा त्यागी।
    • सब जग सोता सुध नहिं पावै, बोलै सो सोता बरड़ावै॥
    • आदि अनादी मेरा साईं॥
    • जो सुमिरूँ तौ पूरन राम,
    • चल-चल रे हंसा, राम-सिंध, बागड़में क्या तू रह्यो बन्ध॥
    • चल चल रे सुआ तेरे आदराज, पिंजरामें बैठा कौन काज?
    • नाम बिन भाव करम नहिं छूटै।
    • दुनियाँ भरम भूल बौराई।
    • मैं तोहि कैसे बिसरूँ देवा!
    • जीव बटाऊ रे बहता मारग माईं।
    • है कोई संत राम अनुरागी, जाकी सुरत साहबसे लागी।
    • मुरली कौन बजावै हो, गगन-मँडलके बीच॥
    • ऐसा साधू करम दहै॥
    • साहब मेरे राम हैं, मैं उनकी दासी;
    • अमृत नीका, कहै सब कोई, पिये बिना अमर नहिं होई।
    • साधो, अलख निरंजन सोई।
    • राम-नाम नहिं हिरदै धरा, जैसा पसुवा तैसा नरा॥
    • साधो, हरि-पद कठिन कहानी।
    • साधो, राम अनूपम बानी।
    • राम भरोसा राखिये, ऊनित नहिं काई।
    • सतगुरुसे सब्द ले, रसना रटन कर,
  • +
    ताज
    • छैल जो छबीला, सब रंगमें रँगीला, बड़ा
    • ध्रुवसे, प्रहलाद, गज ग्राहसे अहिल्या देखि,
    • कोऊ जन सेवै शाह राजा राव ठाकुरकों,
    • साहब सिरताज हुआ नन्दजूका आप पूत,
    • सुनो दिलजानी मेरे दिलकी कहानी तुम,
  • +
    शेष
    • मिटि गयो मौन, पौन-साधनकी सुधि गई,
  • +
    नजीर
    • यारो, सुनो य दधिके लुटैयाका बालपन,
    • जाहिरमें सुत वो नंद जसोदाके आप थे,
    • उनको तो बालपनसे न था काम कुछ जरा,
    • बाले थे बिर्जराज, जो दुनियाँमें आ गये,
    • परदा न बालपनका वो करते अगर जरा,
    • अब घुटनियोंका उनके मैं चलना बयाँ करूँ?
    • पाटी पकड़के चलने लगे जब मदनगोपाल,
    • करने लगे ये धूम जो गिरधारी नंदलाल,
    • कोठेमें होवे फिर तो उसीको ढँढोरना,
    • गर चोरी करते आ गई ग्वालिन कोई वहाँ,
    • गुस्सेमें कोई हाथ पकड़ती जो आनकर,
    • उनको तो देख ग्वालिनें जो जान पाती थीं,
    • कहती थीं दिलमें, दूध जो अब हम छिपायेंगे,
    • सब मिल जसोदा पास यह कहती थीं आके बीर,
    • माता जसोदा उनकी बहुत करतीं मिंतियाँ,
    • माता, कभी ये मुझको पकड़कर ले जाती हैं,
    • मैया, कभी ये मेरी छगुलिया छिपाती हैं,
    • इक रोज़ मुँहमें कान्हने माखन छिपा लिया,
    • थे कान्हजी तो नंद-जसोदाके घरके माह,
    • राधारमनके यारो अजब जाये गौर थे,
    • होता है यों तो बालपन हर तिफ्लका भला,
    • सब मिलके यारो, कृष्णमुरारीकी बोलो जै,
    • जब मुरलीधरने मुरलीको अपने अधर धरी,
    • ग्वालोंमें नंदलाल बजाते वो जिस घड़ी,
    • मोहनकी बाँसुरीके मैं क्या-क्या कहूँ जतन,
    • है आशिक और माशूक जहाँ वाँ शाह वजीरी है बाबा!
    • कुछ जुल्म नहीं, कुछ जोर नहीं, कुछ दाद नहीं, फरियाद नहीं।
    • जिस सिम्त नजर कर देखें हैं, उस दिलवर की फुलवारी है।
    • हम चाकर जिसके हुस्नके हैं, वह दिलवर सबसे आला है।
    • क्या इल्म उन्होंने सीख लिये, जो बिन लेखेंको बाँचे हैं।
    • जब हाथको धोया हाथोंसे, जब हाथ लगे थिरकानेको।
    • था जिसकी खातिर नाच किया, जब मूरत उसकी आय गई।
    • सब होस बदनका दूर हुआ, जब गतपर आ मिरदंग बजी।
    • गर यारकी मर्जी हुई सर जोड़के बैठे।
    • गर खाट बिछानेको मिली खाटमें सोये।
    • उनके तो जहाँमें अजब आलम हैं नजीर आह!
    • है बहारे बाग दुनिया चंदरोज, देख लो इसका तमाशा चंदरोज।
  • +
    कारे खाँ
    • माफ किया मुलकम़ताह दी विभीषनको,
    • छलबलकै थाक्यो अनेक गजराज भारी,
    • वृंदावन कीरति विनोद कुंज-कुंजनमें,
  • +
    करीमबक्श
    • ऐ मेरे रब! तू पाप-हरैया, संकटमें किरपाका करैया।
    • कैसे तुम आ नैहरवा भुलानी।
    • ना जानों, पियासों कैसे होयँ बतियाँ।
  • +
    इन्शा
    • जब छाड़ि करीलकी कुंजनकों, वहाँ द्वारकामें हरि जाय छये।
  • +
    बाजिन्द
    • सुन्दर पाई देह नेह कर राम सों,
  • +
    बुल्लेशाह
    • कद मिलसी मैं बिरहों सताई नूँ॥
    • टुक बूझ कवन छप आया है।
    • माटी खुदी करेंदी यार।
    • अब तो जाग मुसाफिर प्यारे! रैन घटी लटके सब तारे!
  • +
    आदिल
    • मुकुटकी चटक लटक बिंब कुंडलकी,
  • +
    मकसूद
    • लगा भादों मुझे दुख देने भारी
  • +
    मौजदीन
    • इतनी कोई कहो हमारी, मनमोहन ब्रजराज कुवरसों नारी।
  • +
    वाहिद
    • सुंदर सुजानपर, मंद मुसुकानपर,
  • +
    दीन दरवेश
    • हिंदू कहैं सो हम बड़े, मुसलमान कहैं हम्म।
  • +
    अफ़सोस
    • का सँग फाग मचाऊँ री, कुबजा-सँग गिरधारी रहत हैं॥
  • +
    काजिम
    • फाग खेलन कैसे जाऊँ सखी री,
  • +
    खालस
    • तुम नाम-जपन क्यों छोड़ दिया?
    • जिन्हों घर झूमते हाथी, हजारों लाख थे साथी;
  • +
    वहजन
    • करैं अब कौन बहाना, गवन हमरा नगिचाना!
  • +
    लतीफ़ हुसैन
    • ऊधो! मोहन-मोह न जावै।
  • +
    मंसूर
    • अगर है शौक मिलनेका, तो हरदम लौ लगाता जा।
  • +
    यकरंग
    • हरदम हरिनाम भजो री।
    • पिया मिलन कैसे जाओगी गोरी! रंग-रूप सब जात रहो री।
    • मितवा रे, नेकीसे बेड़ा पार।
    • निसिदिन जो हरिका गुन गाय रे!
    • साँवलिया मन भाया रे।
  • +
    कायम
    • गुरु बिनु होरी कौन खेलावै कोई पंथ लगावै॥
  • +
    निजामुद्दीन औलिया
    • परबत बाँस मँगाव मेरे बाबुल! नीके मड़वा छाव रे!
  • +
    फ़रहत
    • वृषभानु-नंदिनी झूलैं अली, आनन्द-कन्द ब्रजचन्द साथ।
    • बंसी मुखसों लगाय ठाढ़े श्रीराधावर,
    • मारो मारो हो स्याम पिचकारी हो।
  • +
    काजी अशरफ महमूद
    • ठुमुक ठुमुक पग कुमुक-कुंज-मग
  • +
    आलम
    • जसुदाके अजिर बिराजैं मनमोहनजू,
    • मुकता मनि पीत हरी बनमाल सु
  • +
    तालिब शाह
    • महबूब बागे सुहागे बने हैं, सुमोहन गरे माल फूलौं हिये हैं।
  • +
    महबूब
    • आगे धेनु धारि गेरि खालम कतारतामें,
  • +
    नफ़ीस खलीली
    • कन्हैयाकी आँखें हिरन-सी नसीली।
  • +
    सैयद कासिम अली
    • मोहन प्यारे जरा गलियोंमें हमारी आजा!
  • +
    हनुमानप्रसाद पोद्दार
    • शोभित चारों भुजा सुदर्शन, शंख गदा, सरसिजसे युक्त।
    • वन्दौं विष्णु विश्वाधार॥
    • परम गुरु राम मिलावनहार।
    • आयो चरन तकि सरन तिहारी।
    • जयति देव जयति देव, जय दयालु देवा।
    • प्रभु तव चरन किमि परिहरौं।
    • बहु जुग बहुत जोनि फिरि हारो।
    • प्रभु तुम अपनो बिरद सँभारो।
    • अब हरि! एक भरोसो तेरो।
    • हे दयामय! दीनबन्धो!! दीनको अपनाइये।
    • प्रभु! मेरो मन ऐसो ह्वै जावै।
    • चहौं बस एक यही श्रीराम।
    • मेरे एक राम-नाम आधार।
    • हुआ अब मैं कृतार्थ महाराज।
    • नाथ मैं थारो जी थारो।
    • नाथ! थारै सरण पड़ी दासी।
    • नाथ! मनें अबकी बार बचाओ॥ टेक॥
    • नाथ! थारै सरणै आयो जी!
    • सुन्यो तेरो पतितपावन नाम!
    • दीनबन्धो! कृपासिन्धो! कृपाबिन्दू दो प्रभो!
    • नाथ! अब कैसे हो कल्याण?
    • एक लालसा मनमहँ धारौं।
    • कर प्रणाम तेरे चरणोंमें लगता हूँ अब तेरे काज।
    • मोकों कछू न चहिये राम।
    • खड़ा अपराधी प्रभुके द्वार!
    • होगा कब वह सुदिन समय शुभ, मायावी मन बनकर दीन।
    • बना दो विमलबुद्धि भगवान।
    • अब कित जाऊँजी, हार कर सरणै थाँरै आयो॥
    • नाथ अब लीजै मोहि उबार!
    • सनातन सत-चित आनँद रूप।
    • हे निर्गुण! हे सर्वगुणाश्रय! हे निरुपम! हे उपमामय!।
    • हे नाथ! तुम्हीं सबके मालिक तुम ही सबके रखवारे हो।
    • हम महामूढ़ अज्ञानीजन, प्रभु! भवसागरमें डूब रहे।
    • तुम दीनबन्धु जगपावन हो, हम दीन, पतित अति भारी हैं।
    • इस टूटी-फूटी नैयाको भवसागरसे खेना होगा।
    • बना दो बुद्धिहीन भगवान॥
    • मोहन, राखु पद-रजतरै॥
    • हे स्वामी! अनन्य अवलम्बन, हे मेरे जीवन-आधार!
    • पतित नहीं जो होते जगमें, कौन पतितपावन कहता?
    • सकुच भरे अधखिले सुमनमें छिपकर रहता प्रेम-पराग।
    • जय जगदीश हरे प्रभु! जय जगदीश हरे!
    • हर हर हर महादेव!
    • बन्धुगणो! मिलि कहो प्रेमसे ‘यदुपति ब्रजपति श्यामा-श्याम।’
    • साधन नाम-सम नहिं आन।
    • बन्धुगणो! मिल कहो प्रेमसे,—‘रघुपति राघव राजाराम।’
    • भूल जगके विषयनकों, जप मन हरिको नाम॥
    • राम राम राम भजो, राम भजो, भाई।
    • भली है राम-नामकी ओट।
    • और सब भूल-भले ही, श्रीहरिनाम न भूल॥
    • कर मन हरिको ध्यान, राम गुन गाइये।
    • राम राम गाओ संतो, राम राम गाओ।
    • करतलसों ताली देत, राम मुख बोली।
    • प्रेममुदित मनसे कहो राम राम राम।
    • मुखसों कहत राम-नाम पंथ चलत जोई।
    • बिनती सुण म्हारी, सुमरो सुखकारी हरिके नामनैं॥
    • राम राम राम राम राम राम राम।
    • राम राम राम राम राम राम राम,
    • चाहता जो परम सुख तू, जाप कर हरिनामका।
    • रे मन हरि सुमिरन करि लीजै॥ टेक॥
    • मन बन मधुप हरिपद-सरोरुह लीन हो।
    • हरिको हरि-जन अतिहि पियारे।
    • मैं नित भगतन हाथ बिकाऊँ।
    • तूँ भाइ म्हारो रे म्हारो।
    • पुत्र-शोक सन्तप्त कभी कर, दारुण दुख है देती।
    • चेत कर नर, चेत कर, गफलतमें सोना छोड़ दे।
    • पलभर पहले जो कहता था, यह धन मेरा यह घर मेरा।
    • तजो रे मन झूठे सुखकी आसा।
    • करत नहिं क्यों प्रभुपर बिस्वास।
    • जगतमें स्वारथके सब मीत।
    • मन, कछु वा दिनकी सुधि राख।
    • अरे मन, तू कछु सोच-बिचार।
    • अरे मन, कर प्रभुपर बिस्वास।
    • मूढ! केहि बलपर तू इतरात॥
    • छोड मन तू मेरा-मेरा, अंतमें कोई नहीं तेरा॥
    • जगतमें कोइ नहिं तेरा रे।
    • जगतमें कीजै यौं ब्यवहार।
    • दुर्जन संग कबहुँ नहिं कीजै।
    • इधर-उधर क्यों भटक रहा मन-भ्रमर, भ्रान्त उद्देश्य विहीन।
    • शुद्ध, सच्चिदानंद, सनातन, अज अक्षर, आनँद-सागर।
    • मन सत-संगति नित कीजै।
    • स्याम मोहि तुम बिन कछु न सुहावै।
    • स्याम! अब मत तरसाओजी।
    • ऊधो! तुम तो बड़े बिरागी।
    • बनहिं बन स्याम चरावत गैया॥
    • ऊधो मधुपुरका बासी।
    • बिदुर-घर स्याम पाहुने आये।
    • हरि अवतरे कारागार॥
    • नंदसुत चुपकै माखन खात।
    • स्यामने मुरली मधुर बजाई।
    • माधव! हौं तुम्हरे संग जैहौं।
    • नाचत गौर प्रेम अधीर।
    • स्याम मोरे ढिगतें कबहुँ न जावै।
    • स्याम तव मूरति हृदय समानी।
    • धन्य-धन्य ब्रजकी नर-नारी।
    • प्रभु! मैं नहिं नाव चलावौं।
    • प्रभु बोले मुसुकाई।
    • ऊधौ! सो मनमोहन रूप।
    • अब तो कुछ भी नहीं सुहावै, एक तूँ ही मन भावै है।
    • मिलनेको प्रियतमसे जिसके प्राण कर रहे हाहाकार।
    • देख दु:खका बेष धरे मैं नहीं डरूँगा तुमसे, नाथ।
    • सूर्य-सोममें, वायु-व्योममें, सलिल-धार, धरनीमें तुम।
    • इस अखिल विश्वमें भरा एक तू ही तू।
    • देख एक तू ही तू ही तू।
    • परम प्रिय मेरे प्राणाधार!
    • पिता चले, जननी भी बिछुड़ी, शक्ति और सौन्दर्य गया।
    • बाल, युवा, वृद्धावस्था हैं तीनों पूरी हो जाती।
    • ‘मैं-मैं’ कहता भटक रहा, भवसागरकी चोटें सहता।
    • समझा, इस ‘मैं’ में औ तुझमें किसी तरहका भेद नहीं।
    • प्रियतम! न छिप सकोगे, चाहे जो वेष धर लो।
    • स्वागत! स्वागत! आओ प्यारे!
    • सौंप दिये मन-प्राण उसीको, मुखसे गाते उसका नाम।
    • सकल जग हरिको रूप निहार।
    • देख निज नित्य निकेतन द्वार॥
    • भीषण तमपरिपूर्ण निशीथिनि, निविड़ निरर्गल झंझावात।
    • ज्यों-ज्यों मैं पीछे हटता हूँ त्यों-त्यों तुम आगे आते।
    • विश्व-वाटिकाकी प्रति क्यारीमें क्यों नित फिरता माली।
    • अनोखा अभिनय यह संसार!
    • संत महा गुनखानी।
    • विश्वपावनी बाराणसिमें संत एक थे करते वास।
    • सर्व-शिरोमणि विश्व-सभाके, आत्मोपम विश्वंभरके।
  • अन्तिम पृष्ठ

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