महापुरुषोंके प्रत्येक भाव एवं क्रियामें सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव भरा रहता है, इसीलिये श्रीगीताजीमें उन्हें ‘सर्वभूतहिते रता:’ कहा गया है। जैसे हमें संसार प्रत्यक्ष दिखायी देता है वैसे ही उन्हें यह प्रत्यक्ष दिखायी देता है कि जो भाई-बहिन अब इस मनुष्यजन्ममें भगवत्प्राप्तिके लिये चेष्टा न करके अपना समय प्रमाद तथा बुरे आचरणोंमें बिताते हैं, परलोकमें उन्हें कितना महान् कष्ट भोगना पड़ेगा। उस भावी दु:खसे हमें बचानेके लिये उनका सब तरहका प्रयास होता है। हमारी धारणामें परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका भगवान्से अधिकारप्राप्त पुरुष थे। उन्होंने अपने आचरणोंसे एवं समय-समयपर पारमार्थिक बातोंसे लोगोंको भगवान्की ओर लगानेका महान् प्रयास किया है। लगभग ६०-६५ वर्ष पहले उन्होंने जो आध्यात्मिक प्रवचन दिये थे उन्हें किसी श्रद्धालु सज्जनने लिपिबद्ध कर लिये थे। उन लिपिबद्ध प्रवचनोंका साधारण भाई-बहिनोंको आध्यात्मिक लाभ मिल जाय, इस उद्देश्यसे उन प्रवचनोंको पुस्तकका रूप दिया जा रहा है। इन प्रवचनोंमें उन्होंने अपने जीवनकी बातें तथा हम सभी लोगोंके लिये महान् उपयोगी बातें कही हैं। हमें आशा है कि आपलोग इन प्रवचनोंको पढ़कर जीवनमें लाकर विशेष लाभ लेंगे।