॥ श्रीहरि:॥

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भगवत्प्राप्तिमें भावकी प्रधानता

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका ने अपने जीवनकालमें स्थान-स्थानपर बहुत ही भगवद्विषयक प्रवचन दिये, उनका एकमात्र उद्देश्य था कि हमलोगोंका, मनुष्यमात्रका उद्धार हो। इन प्रवचनोंके अन्तर्गत एक बहुत ही रहस्यमय बात पढ़ी गयी। उसमें बताया गया कि भगवान् रामचन्द्रजी जब अन्तर्धान होने लगे तो अयोध्यावासियोंको सरयूकी धारमें गोता लगवाकर अपने साथ परमधाम ले गये। भगवान् श्रीकृष्णने ऐरे (एक प्रकारकी घास) की धारसे यदुवंशियोंका उद्धार किया। इसी प्रकार मैं (गोयन्दकाजी) पुस्तकों एवं सत्संगद्वारा मनुष्योंका उद्धार करता हूँ। यह बात पढ़-सुनकर हमारे रोमांच हो जाना चाहिये। ऐसे अधिकार-प्राप्त महापुरुषके प्रवचन हमें सुनने-पढ़नेको मिल जायँ, यह हमारा कितना अहोभाग्य है। ऐसे प्रवचनोंको पढ़कर, मननकर जीवनमें लाकर हम केवल अपना उद्धार ही नहीं, अनेक भाई-बहिनोंका उद्धार करानेमें सहायक हो सकते हैं। उन्हीं महापुरुषके समय-समयपर दिये गये हुए प्रवचनोंको पुस्तकोंका रूप दिया जा रहा है। हमें आशा है कि आपलोग इन प्रवचनोंको मनोयोगपूर्वक पढ़कर लाभ उठायेंगे।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • भगवत्प्राप्तिमें भावकी प्रधानता
  • कर्तव्य-पालन एवं दूसरोंके अधिकारकी रक्षा
  • निष्कामभावकी सूक्ष्मता
  • सत्संगका रहस्य
  • महात्मासे कैसे लाभ उठावें
  • पात्रता एवं श्रद्धा
  • सगुण-साकार भगवान‍्का दर्शन एवं प्रभाव
  • महत्त्वपूर्ण बात
  • मनुष्य-जीवनकी सफलताका उपाय
  • वीरताका रहस्य
  • कल्याण-प्राप्तिका सरल साधन
  • भगवान् एवं महात्माका प्रभाव
  • साधन तीव्र करनेके लिये प्रेरणा
  • भगवत्स्मृतिकी महिमा
  • अन्तिम पृष्ठ

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