गीताप्रेसके संस्थापक श्रीजयदयालजी गोयन्दका इस युगके एक अधिकारप्राप्त महापुरुष थे। उनके एक ही लगन रहती थी कि मनुष्योंका कल्याण कैसे हो? स्वर्गाश्रम ऋषिकेशमें ग्रीष्मकालमें ३-४ महीने सत्संग करानेकी व्यवस्था की। अन्य स्थानोंपर भी वे सत्संग करते थे। भगवत्-विषयमें वे पूर्णताको प्राप्त थे। उनके प्रवचनोंसे आध्यात्मिक जगत् को निरन्तर लाभ हो रहा है। साधकको क्या चीजें बाधक हैं। कौन-सा साधन करनेसे वह शीघ्र भगवत्प्राप्ति कर सकता है। जप, ध्यान, सत्संग—यह त्रिवेणी साधकके लिये अत्यन्त लाभदायक है। कञ्चन, कामिनी एवं शरीरका आराम—ये साधकके लिये महान् बाधक हैं। जो साधक सत्यसंकल्प है, उसकी स्वयंकी धारणा साधनमें बहुत लाभदायक है। साधन किस ढंगसे करना चाहिये? कैसे वह साधन जो वर्षोंमें लाभदायक हो, वह महीनोंमें या दिनोंमें ही हमारा कल्याण कर सकता है। इन विषयोंके प्रवचन इस पुस्तकमें हैं और भी बहुत-सी अमूल्य बातें इस पुस्तकके लेखोंमें आयी हैं। पाठकोंसे सविनय निवेदन है कि इस पुस्तकको ध्यानसे पढ़ें और पढ़नेके लिये प्रेरणा दें।