॥ श्रीहरि:॥

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भगवत्प्राप्तिकी अमूल्य बातें

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

गीताप्रेसके संस्थापक श्रीजयदयालजी गोयन्दका इस युगके एक अधिकारप्राप्त महापुरुष थे। उनके एक ही लगन रहती थी कि मनुष्योंका कल्याण कैसे हो? स्वर्गाश्रम ऋषिकेशमें ग्रीष्मकालमें ३-४ महीने सत्संग करानेकी व्यवस्था की। अन्य स्थानोंपर भी वे सत्संग करते थे। भगवत्-विषयमें वे पूर्णताको प्राप्त थे। उनके प्रवचनोंसे आध्यात्मिक जगत् को निरन्तर लाभ हो रहा है। साधकको क्या चीजें बाधक हैं। कौन-सा साधन करनेसे वह शीघ्र भगवत्प्राप्ति कर सकता है। जप, ध्यान, सत्संग—यह त्रिवेणी साधकके लिये अत्यन्त लाभदायक है। कञ्चन, कामिनी एवं शरीरका आराम—ये साधकके लिये महान् बाधक हैं। जो साधक सत्यसंकल्प है, उसकी स्वयंकी धारणा साधनमें बहुत लाभदायक है। साधन किस ढंगसे करना चाहिये? कैसे वह साधन जो वर्षोंमें लाभदायक हो, वह महीनोंमें या दिनोंमें ही हमारा कल्याण कर सकता है। इन विषयोंके प्रवचन इस पुस्तकमें हैं और भी बहुत-सी अमूल्य बातें इस पुस्तकके लेखोंमें आयी हैं। पाठकोंसे सविनय निवेदन है कि इस पुस्तकको ध्यानसे पढ़ें और पढ़नेके लिये प्रेरणा दें।
  • प्रथम पृष्ठ
  • नम्र निवेदन
  • +
    भावना ऊँची-से-ऊँची करनी चाहिये
    • कुछ ध्यानमें रखनेयोग्य सूत्र
  • भगवत्प्राप्ति कठिन नहीं
  • भगवान् के प्रेम और रहस्यकी बातें
  • महात्माके संकल्प और क्रियाकी विशेषता
  • श्रद्धाकी महिमा
  • अपने सिद्धान्तमें दृढ़ रहे
  • नाम भिन्न-भिन्न पर तत्त्व एक
  • सभीकी मुक्ति सम्भव
  • नाम तथा रूपकी पूजा कल्याणमें बाधक
  • मुक्तिदायक क्षण
  • विशेष आसक्तिके विषय तथा उनसे बचनेका उपाय
  • श्रद्धा और प्रेमका स्वरूप
  • भगवत्प्राप्तिमें प्रयत्नकी आवश्यकता
  • अपनी धारणा और श्रद्धासे महान् लाभ
  • सुनी हुई बातोंको आचरणमें लानेसे ही लाभ
  • परहित ही सार है
  • पालन करनेयोग्य सार बातें
  • अन्तिम पृष्ठ

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