साधक भाई-बहनोंकी एक धारणा बन गयी है कि भगवत्प्राप्ति करनेके लिये एकान्तमें जाना, तीर्थस्थानमें जाना, वनमें जाना आवश्यक है। वहाँ जाकर कठोर परिश्रम, साधना-तपस्या करके ही भगवत्प्राप्ति सम्भव है। कई ऐसे प्रचलित भ्रम फैले हुए हैं कि स्त्री, शूद्र, वैश्य एवं गृहस्थोंका कल्याण नहीं होता। श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका को जो गीताप्रेसके संस्थापक थे, बहुत छोटी आयुमें ही भगवद्दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होनेसे इनका एकमात्र उद्देश्य जीवोंका कल्याण करनेका बन गया था। हमारी धारणामें अपने प्रवचनोंद्वारा जीवोंका उद्धार करनेका अधिकार भी उन्हें भगवान् से प्राप्त हो गया था। वे अपने उद्देश्यकी दिशामें ऋषिकेश गंगाके उस पार ग्रीष्मकालमें सत्संग-हेतु पधारते थे। वहाँ वटवृक्षके नीचे या गंगा-किनारे बालूपर सत्संग करते थे। उन्होंने अपने प्रवचनोंमें जो ऊपर लिखे भ्रम लोगोंमें फैले रहते हैं, उनका युक्तिसहित निराकरण किया है और सबके लिये भगवत्प्राप्ति कठिन नहीं अपितु सहज है, सभी वर्गके भाई-बहनोंको भगवत्प्राप्ति सुगमतासे हो सकती है—इस आशयके प्रवचन दिये हैं। भगवत्प्राप्ति कठिन माननेसे कठिन और सुगम माननेसे सुगम है, यह साधककी मान्यता एवं श्रद्धापर निर्भर है, ऐसा बताया गया है।
माताएँ-बहनें पतिकी सेवासे, व्यापारी व्यापारसे, पुत्र पिताकी सेवासे, शिष्य गुरुकी सेवासे, गृहस्थ अतिथि-सेवासे भगवत्प्राप्ति कर सकते हैं। ये भाव उनके प्रवचनोंमें बहुत बार आये हैं। साधकको निराश होना ही नहीं चाहिये।
उपर्युक्त भावोंका विवेचन श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दकाके प्रवचनोंमें कहीं विस्तार और कहीं संक्षेपसे हुआ है। उन प्रवचनोंसे हम लाभान्वित हों इसलिये उन प्रवचनोंको पुस्तकरूप दिया जा रहा है। पाठकोंसे प्रेमपूर्वक निवेदन है कि इन प्रवचनोंको अवश्य पढ़ने-पढ़ानेकी कृपा करें।