॥ श्रीहरि:॥

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भगवत्प्राप्ति की युक्तियाँ

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

मनुष्यजन्मका एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्ति है। साधक उसके लिये अपनी ओरसे प्रयास करता है। भगवत्प्राप्तिमें साधन आवश्यक है। मनुष्य साधन करता भी है, परन्तु इसमें युक्ति तथा विवेक बहुत सहायक हैं। ‘बिनु सतसंग बिबेक न होई’—विवेककी जागृति तथा युक्तियोंकी जानकारी सत्संगसे ही प्राप्त होती है। जैसे एक मनुष्य भोजन बनाता है तो उसको बहुत प्रकारकी सामग्री एकत्र करनी तथा भोजन बनानेका प्रयास करना पड़ता है, परन्तु वही भोजन एक साधुको भिक्षामें बना-बनाया मिल जाता है। इसी प्रकार एक साधकको महापुरुषोंके द्वारा की हुई साधनाका अनुभव सत्संगसे तत्काल प्राप्त हो जाता है। उसे ऐसी युक्तियोंकी जानकारी हो जाती है जो उसे शीघ्र भगवत्प्राप्ति करा सकती हैं।
गीताप्रेसके संस्थापक श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका के सत्संग करानेकी बड़ी लगन थी। वे ग्रीष्मकालमें प्राय: ३-४ महीने स्वर्गाश्रम ऋषिकेशमें वटवृक्षके नीचे तथा वनमें सत्संग कराते रहते थे। उन प्रवचनोंको किसी भाईने लिख लिया था। उन प्रवचनोंको पुस्तकरूपमें प्रकाशित करनेका प्रयास किया गया है, जिससे पाठकोंको उन प्रवचनोंसे लाभ मिल सके। इन प्रवचनोंमें श्रद्धेय श्रीगोयन्दकाजीने यह बात कही है कि साधनसे मुझे अनुभव पहले हुए, पीछे वे बातें ग्रन्थोंमें मिलीं। हमें वे बातें जो कितने अध्ययनसे मिलतीं, तत्काल उनके अनुभवसे प्राप्त हो रही हैं, यह कितनी भारी सुगमता है।
सभी पाठकोंसे सादर प्रार्थना है कि इस पुस्तकको पढ़कर अपना जीवन आदर्श बनानेका प्रयास करें, जिससे हमारे जीवनसे अन्य भाई-बहिनोंको भी प्रेरणा मिले।
  • प्रथम पृष्ठ
  • निवेदन
  • कुन्ती और युधिष्ठिरके आदर्श आचरणसे शिक्षा
  • भगवान् और महापुरुषोंमें श्रद्धा कैसे बढ़े, अहंकारका नाश कैसे हो?
  • क्रोधनाशके विविध उपाय
  • आनन्दरूपसे परमात्माका ध्यान
  • विविध प्रश्नोत्तर
  • भगवान् विष्णुका ध्यान और पूजा
  • ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन
  • प्रेम-भक्ति
  • भगवान् वासुदेवका ध्यान
  • परस्पर प्रेम बढ़ायें
  • अन्तिम पृष्ठ

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