॥ श्रीहरि:॥

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अष्टावक्रगीता

हिन्दी/संस्कृत

महर्षि अष्टावक्रद्वारा प्रणीत यह गीता अत्यन्त प्राचीनकालसे वेदान्त-मार्गी मुमुक्षु-साधकोंके लिये चिन्तामणिके सदृश प्रकाशमान है। महाभारतके वनपर्वमें प्राप्त अष्टावक्रगीतासे यह सर्वथा भिन्न एक स्वतन्त्र स्तरीय ग्रन्थ है। राजर्षि जनक और अष्टावक्रजीके संवादरूपमें निबद्ध प्रस्तुत गीता अत्यन्त उत्कृष्ट मनोभूमिमें प्रकट हुई है। इसके एक-एक श्लोकमें चिन्तनकी गहराईकी मनोहारी छाप दृष्टिगोचर होती है। अद्वैतज्ञानका निरूपण, उसकी प्राप्तिके चरणबद्ध उपाय तथा ब्रह्मज्ञानीके लक्षण इसमें स्पष्ट रूपसे वर्णित हैं। आत्मकल्याणके इच्छुक साधकोंके लिये परमोपयोगी तथा इक्कीस प्रकरणोंमें विभक्त यह गीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत है।
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