आरती पूजनके अन्तमें इष्टदेवताकी प्रसन्नताके हेतु की जाती है। इसमें इष्टदेवको दीपक दिखानेके साथ ही उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है। आरतीके दो भाव हैं जो क्रमश: ‘नीराजन’ और ‘आरती’ शब्दसे व्यक्त हुए हैं। नीराजन (नि:शेषेण राजनम् प्रकाशनम्)-का अर्थ है—विशेषरूपसे, नि:शेषरूपसे प्रकाशित करना। अनेक दीप-बत्तियाँ जलाकर विग्रहके चारों ओर घुमानेका अभिप्राय यही है कि पूरा-का-पूरा विग्रह एड़ीसे चोटीतक प्रकाशित हो उठे—चमक उठे, अंग-प्रत्यंग स्पष्टरूपसे उद्भासित हो जाय, जिसमें दर्शक या उपासक भलीभाँति देवताकी रूप-छटाको निहार सके, हृदयंगम कर सके। दूसरा ‘आरती’ शब्द (जो संस्कृतके आर्तिका प्राकृत रूप है और जिसका अर्थ है—अरिष्ट) विशेषत: माधुर्य-उपासनासे सम्बन्धित है। ‘आरती वारना’ का अर्थ है—आर्ति-निवारण, अनिष्टसे अपने प्रियतम प्रभुको बचाना। इस रूपमें यह एक तान्त्रिक क्रिया है, जिससे प्रज्वलित दीपक अपने इष्टदेवके चारों ओर घुमाकर उनकी सारी विघ्न-बाधा टाली जाती है। आरती लेनेसे भी यही तात्पर्य है—उनकी ‘आर्ति’ (कष्ट)-को अपने ऊपर लेना। बलैया लेना, बलिहारी जाना, बलि जाना, वारी जाना, न्योछावर होना आदि सभी प्रयोग इसी भावके द्योतक हैं। इसी रूपमें छोटे बच्चोंकी माताएँ तथा बहिनें लोकमें भी आरती या आरत उतारती हैं। यह ‘आरती’ मूलरूपमें कुछ मन्त्रोच्चारणके साथ केवल कष्ट-निवारणके भावसे उतारी जाती रही होगी। आजकल वैदिक-उपासनामें उसके साथ-साथ वैदिक मन्त्रोंका उच्चारण होता है तथा पौराणिक एवं तान्त्रिक-उपासनामें उसके साथ सुन्दर-सुन्दर भावपूर्ण पद्य-रचनाएँ गायी जाती हैं। ऋतु , पर्व, पूजाके समय आदि भेदोंसे भी आरती की जाती है।