॥ श्रीहरि:॥

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अमृत कण

श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

हिन्दी/संस्कृत

भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारके लेखोंका सुन्दर संग्रह आपकी सेवामें प्रस्तुत किया जा रहा है। इस संग्रहमें कतिपय स्फुट विषयोंके साथ-साथ आध्यात्मिक साधन-सम्बन्धी अतिशय उपादेय ठोस सामग्रीका भी समावेश हुआ है।
व्यक्तिके गुणोंका प्रभाव सर्वोपरि होता है और वह अमोघ होता है। श्रीभाईजी अध्यात्म-साधनकी उस परमोच्च स्थितिमें पहुँच गये थे, जहाँ पहुँचे हुए व्यक्तिके जीवनसे जगत् का, परमार्थके पथपर बढ़ते हुए जिज्ञासुओं एवं साधकोंका मंगल होता है। हमारा विश्वास है कि जो व्यक्ति इन लेखोंको मननपूर्वक पढ़ेंगे एवं अपने जीवनमें उन बातोंको उतारनेका प्रयत्न करेंगे, उनको व्यवहार एवं परमार्थमें निश्चय ही विशेष सफलता प्राप्त होगी।
  • प्रथम पृष्ठ
  • नम्र निवेदन
  • भारतीय वर्ण-धर्मका स्वरूप और महत्त्व
  • क्या हम बुद्धिमान् हैं?
  • अध्यात्मप्रधान भारतीय संस्कृति
  • भोगवाद और आत्मवाद
  • जनतन्त्र या असुरतन्त्र
  • जनतन्त्रकी रक्षा कैसे हो?
  • परमधाम
  • कौन कर्मबन्धनसे मुक्त होते तथा स्वर्गको जाते हैं
  • धृतिका स्वरूप
  • परस्वापहरण-त्याग या अस्तेय-धर्म
  • सेवाका स्वरूप
  • श्रीमद्भगवद्गीतामें मानवका त्रिविध
  • स्वरूप और साधन
  • मेरी प्रत्येक चेष्टा भगवान् की सेवा है
  • वैष्णवताका स्वरूप
  • गीतामें भगवान् के स्वरूप, परलोक-पुनर्जन्म तथा भगवत्प्राप्तिका वर्णन
  • पति-पत्नी (तथा सब)-के लिये हितकर अठारह अमृत-संदेश
  • भोजन-शुद्धि
  • मांस-अंडेका भोजन और चमड़ेका व्यवहार तुरंत त्याग करें
  • पुराणोंमें दिव्य उपदेश
  • खान-पानमें भयानक अशुद्धि
  • भोजन एक पवित्र यज्ञ है
  • मांसाहारका तथा गोमांसका घृणित प्रचार
  • अशोक होटलमें गोमांस
  • पतनकारी सिनेमा और गंदे पोस्टरोंका
  • घोर विरोध परमावश्यक
  • +
    अहिंसा परम धर्म और मांसभक्षण महापाप
    • (मांसभक्षणसे सब प्रकार हानि)
    • मांस खानेवालोंको क्या फल मिलता है?
    • मांसभक्षणसे रोगोत्पत्ति तथा स्वास्थ्यनाश
  • +
    ब्रह्मवैवर्तपुराणके श्रीकृष्ण
    • भगवान् भक्ताधीन
    • गुरु महर्षि सान्दीपनिजीकी पत्नी श्रीकृष्णसे कहती हैं—
    • भगवान् के स्मरणसे बाहर-भीतरकी शुद्धि—
    • भगवान् की सेवामें लगनेवाला ही आत्मीय है—
    • जो भगवान् में बुद्धिको नहीं लगाता, वह कैसा आत्मीय?
    • सत्यरूपी धर्मकी रक्षाके लिये त्याग—
    • रामने वन जाते समय शोक-विह्वल पिता दशरथसे कहा—
    • पितासे सौगुनी अधिक पूजनीया माता—
    • किस-किसको माता माने?
    • माता-पिता-गुरु, पत्नी आदिका भरण-पोषण करना चाहिये—
    • हरि मारे तो रखे कौन, हरि रखे तो मारे कौन?
    • रणविमुख न होनेवाला वीर यशोदायक स्वर्गको प्राप्त होता है
    • रोग आदिका कारण पाप
    • धर्म-पत्नीके त्यागसे नरककी प्राप्ति
    • पृथ्वी किनके भारसे पीड़ित रहती है?
    • पृथ्वी देवी ब्रह्माजीसे कहती हैं—
  • +
    श्रीमद्भागवतकी महत्ता१
    • मथुराकी वैदिक और पौराणिक महत्ता
    • मथुराका परवर्ती इतिहास
  • योगवासिष्ठका साध्य-साधन
  • +
    शिवपुराणमें शिवका स्वरूप
    • एक ही परमतत्त्व
    • भगवान् शिव और विष्णुमें तथा ब्रह्मा, विष्णु , रुद्रमें अभिन्नता
    • शिव और शक्तिमें अभिन्नता
    • शिव सनातन ब्रह्म तथा लिंगपूजा भी सनातन
  • शिवतत्त्व और शैवोपासना
  • पुरुषोत्तम-मासके कर्तव्य
  • सत्कथाका महत्त्व
  • +
    भगवान् बुद्धदेव और उनका सिद्धान्त
    • जन्म और जीवन
    • बुद्ध नास्तिक नहीं थे
    • बुद्धकी शिक्षा
  • बदला लेने या देनेवाले सात प्रकारके पुत्र
  • गया-पिण्ड सभीको दीजिये
  • अन्य धर्मावलम्बी भी सद्गतिके लिये गया-पिण्ड चाहते हैं
  • प्रारब्ध नहीं बदल सकता
  • कर्म रहते जीवकी मुक्ति नहीं
  • मरनेके समय रोगी क्या करे?
  • अच्छी संतानके लिये क्या करे?
  • मृतात्माका आवाहन क्या सत्य है?
  • मृत्युके बाद क्या किया जाय?
  • श्राद्धकी अनिवार्य आवश्यकता
  • वैरसे भयानक दुर्गति
  • +
    सुपुत्रके लक्षण तथा उसकी प्राप्तिका उपाय
    • कुलोद्धारक श्रेष्ठ पुत्र
    • श्रेष्ठ पुत्रके लक्षण
    • पाँच प्रकारके पुत्र
    • पुत्र-प्राप्तिके साधन
  • ‘हरि: शरणम्’ मन्त्रसे महामारी भाग गयी
  • पापोंके अनुसार नारकीय गति
  • एंटीबायोटिक दवाओंके कारखाने रोगनाशके लिये या विस्तारके लिये?
  • महामना मालवीयजीके कुछ संस्मरण
  • चोखी सीख
  • हिंदू साधु-संन्यासियोंका नियन्त्रण
  • स्त्रियोंके लिये चार आवश्यक नियम
  • दोष देखना दोष है
  • +
    दहेजका बढ़ा हुआ पाप
    • अभिभावकों और लड़कोंसे अपील
  • +
    जर्मन विद्वान् का हिंदी और भारतीय संस्कृतिसे प्रेम
    • पत्रका छाया-चित्र
  • समझने-सीखनेकी चीज
  • रेशमी कपड़ा अपवित्र क्यों है?
  • दो मित्रोंका आदर्श प्रेम
  • गुरुजीका उपदेश
  • +
    माँ-बेटेकी बातचीत
    • क्या मत करो और क्या करो
  • अन्तिम पृष्ठ

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