॥ श्रीहरि:॥

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आध्यात्मिक प्रवचन

श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

हिन्दी/संस्कृत

परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका को भगवान‍्ने चतुर्भुज-रूपसे प्रकट होकर स्वत: दर्शन देनेकी कृपा की। उस बातकी ओर संकेत करते हुए श्रीगोयन्दकाजी कहा करते थे कि मेरे ऊपर भगवान‍्की विशेष कृपा हुई। सत्संगी भाइयोंको उन्होंने प्रवचनमें संकेत किया कि आपलोगोंपर भी भगवान‍्की विशेष दया है। इस कहनेमें यह भाव प्रतीत होता है कि ऐसे अधिकारप्राप्त महापुरुषके दर्शन, संग, प्रवचनोंका हमें लाभ मिलना हमारे ऊपर भगवान‍्की विशेष दया है। यह समय साधनके लिये बहुत अनुकूल है। उनका कहना था कि वटवृक्ष, गंगाजी, पहाड़ियाँ तथा ऐसे पवित्र स्थानपर ऐसी ऊँची सत्संगकी बातें मिलना भगवान‍्की कितनी दया है। इस दृश्यकी स्मृतिमात्रसे वैराग्य पैदा होता है। ऐसे स्थानपर दिये हुए इन अमूल्य प्रवचनोंको पढ़नेका हमें सौभाग्य मिल रहा है यह भगवान‍्की कितनी दया है। ऐसे प्रवचन सभी भाई-बहिनोंको उपलब्ध हों, इस भावसे यह पुस्तक उनके अमूल्य वचन संगृहीत करके तैयार की गयी है। आपलोग इसका अधिक-से-अधिक स्वयं लाभ उठायें और दूसरे सज्जनोंको प्रेरणा दें।
  • प्रथम पृष्ठ
  • नम्र निवेदन
  • सत्संगकी अमूल्य बातें
  • महापुरुषोंकी महिमा
  • मान-बड़ाई चाहनेवालोंकी श्रेणियाँ
  • भगवान‍्में प्रेम होनेके उपाय
  • भगवान‍्की दयालुता
  • वैराग्यकी आवश्यकता
  • साधनाका क्रम
  • श्रद्धानुसार आध्यात्मिक लाभ
  • भगवत्प्राप्तिके सरल उपाय
  • सभी साधनोंकी फलमें एकता
  • भगवान‍्का ध्यान
  • सभीका कल्याण कैसे हो
  • धर्म और नीति
  • चेतावनी
  • महात्माकी शरण
  • श्रद्धाके अनुसार फल
  • रहस्यकी बातें
  • महात्मासे भावनानुसार लाभ
  • ईश्वरकी दयाका तत्त्व
  • सत्संगकी आवश्यकता
  • व्यवहार-सुधारसे मुक्ति
  • निराकारस्वरूपका ध्यान
  • प्रेमका स्वरूप
  • भक्तकी विशेषता
  • अन्तिम पृष्ठ

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